प्रधानमंत्री डॉ मननोहन सिंह यूं तो कॉर्पोरेट जगत के दुलारे समझे जाते हैं, मगर एकबार जब उन्होंने कॉर्पोरेट बाबुओं की ऊंची तनख्वाह पर कुछ कहने की हिम्मत की तो पूरे कॉर्पोरेट जगत में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि जब मटर के दाने डालोगे तो बंदर ही मिलेंगे न. मतलब साफ था गुरिल्ला फांसने के लिए सोने के बिस्किट डालने ही होंगे.
रविवार, 15 फ़रवरी 2009
किसके लिए मंदी
मंदी के मतलब
कभी एक ब्रैंड था अब ब्रैंड ही बैंड हैं. कभी मेट्रो में भी मॉल नहीं थे, अब हर चौराहे- हर नुक्कड पर मॉल दिख रहे हैं. इसका नशा इस कदर सिर चढ़कर बोला कि लोग साम्यवादी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने लगे. कॉर्पोरेट कल्चर और मैंनेजर संस्कृति ने पूरे बाजार या यू कहें पूरी व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया. लोगों को इस व्यवस्था में मजा आने लगा. कॉर्पोरेट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए सरकार पर मध्यवर्ग का दबाव बढ़ने लगा. सरकारों ने कॉर्पोरट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया.
सोमवार, 9 फ़रवरी 2009
हिंदी क्यों हमारी राष्ट्रभाषा है?
रविवार, 8 फ़रवरी 2009
नुक्ते का फेर
अपने इकतीस साल के जीवन में, जाने-अनजाने मैं असंख्य लोगों, प्राणियों, जड़-चेतनों का कर्जदार रहा. मैं इन सबका आभारी भी हूं. मैं चाहकर भी, या यूं कहें कि अपने जीवन का शेष हिस्सा होम करके भी इनके कर्ज से मुक्त नहीं हो पाऊंगा. मैं ही क्या, इस धरती के कमोबेश सभी इंसानों की यही स्थिति है कि वह चाहकर भी कर्ज से मुक्त नहीं हो सकता है. दरअसल, मानवमात्र का जीवन अनेक तरह के कर्जों से उपकृत हुआ करता है. प्राचीन ग्रंथों में मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, गुरूऋण आदि कई ऋणों की चर्चा की गई है और इन कर्जों को चुकाना हर मानव का कर्तव्य बताया गया है.
इसका मतलब कदापि ये नहीं समझा जाना चाहिए कि मैं कर्जखौक हूं. मैं हमेशा कर्ज लेने और उपकृत होने से बचने का प्रयास करता रहा हूं. फिर भी प्रकृति और प्रवृति के वशीभूत होकर मैं बच नहीं पाया.
युग क्रेडिटकार्ड का है यानी उधार लेकर खाने का. चार्वाकी दर्शन यानी यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा, घृतम पीबेत को अपनाने का. दूसरे के पैसे पर ऐश करने का. मामू के धन से फूफा का श्राद्ध करने का. लोक-दर्शन, लगा दो आग पानी में, जवानी उसे कहते हैं. लूटा दो बाप का दौलत, जवानी उसे कहते हैं, के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाने का. संतोषम परमं सुखम का नहीं, बल्कि दाउ आर्ट नॉट डेस्टाइन्ड टू डस्ट के कलयुगी अर्थ समझने का.
साफ है. यह समय, गदहे को बाप कहकर काम बनाने का है. जो इसका कला में जितना निपुण है, वो उतना ही सफल है. धरम की धूरी से चिपके रहने वालों की खैर नहीं. आज के युग में गांधी बनोगे तो उस खास जगह पर गुंह भी नहीं बचेगा.
मतलब, समय बदलाव है. जो आंधी का रुख देखकर ऊंट की तरह करवट नहीं बदलता है, जिसके जिस्म पर वक्त की आंधी लाखों मन तलछट जमा कर देती है, फिर वह चाहकर भी खड़ा नहीं हो सकता. यही सब सोचकर मुझे भी थोड़ा बदलतना पड़ा. भले ही, इस कर्जखोरी ने लोगों को सड़क पर ला खड़ा कर दिया है. अमेरिका में अकेले जनवरी महीने में करीब छह लाख रोज अपना रोजगार खो चुके हैं. पिछले एक साल में करीब इसकतीस लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं. इस वक्त अमेरिका में कुल मिलाकर एक करोड़ सोलह लाख लोग बेरोजगार है. यहां भारत की बात करना भी अनुचित है, क्योंकि भारत में इस बात पर कभी जो दी हीं नहीं जाती है. अपने हठ और अभिमान में फूली भारत सरकार बड़े गर्व से कहती रही है कि वैश्विक आर्थिक संकट का असर उस पर नहीं पड़ेगा और उसका उसका आर्थिक विकास पहले की तरह बना रहेगा. लेकिन, सरकार के इस दावे में कोई दम नहीं था. आंकड़े महंगाई कम होने की बात कही गई, लेकिन महंगाई, अब भी आम लोगों को अपना ग्रास बना रही है. आखिरकार, रिजर्व बैंक को यह घोषणा करना ही पड़ा कि देश गंभीर आर्थिक संकट की दौर से गुजर रहा है.
गंभीर आर्थिक संकट के बावजूद, बुश प्रशासन झुकने के लिए तैयार नहीं था. उसका कहना था कि खुली पूंजी, खुले बाजार और खुले श्रम के विकल्प पर विचार करना अभी जल्दबाजी होगी. वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा भले ही अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट के दलदल से निकालने के लिए भले ही छटपटा रहे हो. भले ही सिनेट पर उनकी त्यौरियां चढ़ी हों, भले ही वह नौ सौ बिलियन डॉलर के पैकेज को मंजूरी देने में हो रही देरी को वे सिनेट का अनुचित और गैर-जिम्मेदाराना कदम मान रहे हो.
अमेरिकी मंदी सिखाती है कि कर्जखौक बनना ठीक नहीं है. शुरुआती दिनों के अनुभव ने कुछ ऐसी सीख दी कि कर्ज मेरे लिए कभी शान नहीं बना. कभी खुद को साबित करने के लिए या शेखी बघारने के लिए कर्ज नहीं ली.
अर्थात, मैं कर्ज लेने के सख्त खिलाफ हूं, मगर ये भी समझता हूं कि वक्त की आंधी के प्रतिकूल जाकर कोई कितनी खड़ा रह सकता है. यही वजह है कि कभी कभार मैं भी कर्ज लेता हूं. वैसे कर्ज लेना कई लोगों की शान में शुमार है. वो बलपूर्वक कर्ज लेते हैं, दूसरों को दिलाते हैं या फिर लेने के लिए मजबूर करते हैं. इस कटेगरी में तथाकथित सेक्लूयर बुद्धिजीवी शामिल हैं, जिन्हें अपने देश, अपनी भाषा, अपनी विचारधारा और अपनी संस्कृति पर शर्म महसूस होती है. ये स्वयं को सेक्यूलर साबित करन के लिए कर्ज लेते हैं. कई लोगों को समाजवादी बनने का ढ़ोग रचने के लिए कर्ज लेना पड़ता है.
लेकिन मेरे लिए कर्ज लेना कभी शान नहीं रहा, कभी खुद को साबित मैंने कर्ज नहीं ली, लेकिन समय ने कई बार मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर किया.
वैसे तो कर्जदार अक्सर बदतमीज होते हैं, लेकिन एक कर्जदार, बड़ा ही बदतमीज निकला. वक्त-बे-वक्त अपना रौब दिखाता है. सरे आम कीचड़ उछालने से नहीं हिचकता है. पता नहीं, जलील करता है या ज़लील.
ऐसा नहीं कि मैंने पहलीबार कर्ज ली हो. बचपन से ही जाने-अनजाने ही कर्ज लेता रहा. उस समय न किसी ने रोका, न टोका. उस समय किसी ने मुझे जलील नहीं किया. कभी किसी ने नहीं कहा कि मौका क्यों लिखते हो. किसी ने नहीं बताया कि हज़ार होता है, हजार नहीं. कभी किसी टेक्स्ट बुक में मौका की जगह मौक़ा लिखा नहीं देखा. कभी किसी ने ज़्यादा लिखने के लिए आग्रह नहीं किया.
लेकिन ये नुक्ते का अफसाना/अफ़साना अब मेरी तरक्की की राह में एक बड़ा रोड़ा बनकर आ खड़ा हुआ है. भाषा के शुद्धतावादी सर्थमकों ने साफ कह दिया था कि तुम एंकर नहीं बन सकते.
आखिर मेरी गलती/ग़लती कहां है. क्या जमीन बोलने वाले हमारे पूज्य गुरूजी गलत थे या मैं. कौन दोषी है. आखिर/आख़िर मेरे गुरूजी ने खुदा को ख़ुदा क्यों नहीं पढ़ाया. जब उस समय यह आग्रह नहीं था तो आज क्यों. क्यों अखबार वाले, मौका को मौक़ा नहीं लिखते. क्यों इज्जत को इज्ज़त नहीं लिखा जाता. जब अंग्रेज ने मेरी भाषा से शब्द लिया तो इस शर्त पर कि तुम जैसा बोलते हो वैसा ही मैं भी बोलूंगा. क्या मैंने अपनी भाषा में अंग्रेजी शब्द शामिल किया तो क्या इसी शर्त पर कि उस शब्द का उच्चारण जैसा अंग्रेज करते हैं, वैसा मैं भी करुं.
ये बदतमीज जब बदतमीज़ बनकर मेरे सामने आता है तो जी करता है कि इसका सिर फोड़ दूं. आखिर ये एहसान फ़रामोश कब तक यूं मेरे सपनों का गला घोंटता रहेगा. आखिर ये कब तक मुझे चिढ़ाता करेगा
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
कितना स्लम कितने डॉग
इस फिल्म के गेम शो हू वॉन्ट्स टू बी ए मिलिनेयर के संचालक की भूमिका के लिए, पहले शाहरूख खान को कहा गया, उनके मना कर देने पर अनिल कपूर ने ये भूमिका निभायी. स्लमडॉग के कार्यकारी निर्माता और सीलेडर फिल्म्स के अध्यक्ष पॉल स्मिथ, हू वॉंट्स टू बी ए मिलिनेयर की मूल कृति के रचयिता है.
देव पटेल यानी जमाल मलिक- मुंबई की झुग्गी झोपड़ी में जन्मा और पला-बढ़ा एक मुस्लिम युवक. जमाल की भूमिका के लिए बॉयल ने सैंकड़ों युवकों को जांचा-परखा.
फ्रैदा पिंटो- लतिका- जमाल की प्रेमिका. पिंटो देशी मॉडल हैं, जिन्होंने इसी फिल्म से अपनी फिल्मी पारी शुरू की हैं.
अगस्त 2007 में वार्नर इंडेपेंडेंट पिक्चर्स ने अमेरिका और पाथे ने दुनियाभर में इस फिल्म के वितरण का अधिकार प्राप्त कर लिया. वार्नर पिक्चर्स ने इस फिल्म के लिए पचास लाख डॉलर खर्च किए, मगर उसे फिल्म से ज्यादा आशाएं नहीं थी. इसलिए उसने फिल्म का अधिकार बेचने का फैसला किया. बाद में वार्नर और फॉक्स सर्च लाइट ने बराबर की साझेदारी पर फिल्म के वितरण का फैसला किया.
ब्रिटेन में यह फिल्म नौ जनवरी 2009 को रिलीज हुई. दूसरे ही सप्ताह में इसने बॉक्स ऑफिस पर कीर्तिमान स्थापित कर दिया. दूसरे सप्ताह में फिल्म देखने वालों की संख्या में सैंतालिस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है. यह वृद्धि फिल्म को चार गोल्डन ग्लोब और ग्यारह बाफ्टा पुरस्कारों के मिलने के बाद हुई. स्लमडॉग के रिलीज होने के मात्र ग्यारह दिनों में इस फिल्म ने यहां इकसठ लाख डॉलर की कमाई की. कुछ मिलाकर इस फिल्म ने यहां बीस मिलियन डॉलर की कमाई की.
भारत में इस फिल्म का प्रीमियर बाइस जुलाई 2009 को हुआ, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री की नामी-गिरामी हस्ती वहां मौजूद थी. भारत में फिल्म के मूल संस्करण के साथ-साथ डब संस्करण भी रिलीज हुआ. 23 जनवरी को पूरे भारत में फिल्म की 351 प्रिंट रिलीज की गई. पहले सप्ताह में इसने बाइस लाख डॉलर की कमाई की. पहले सप्ताह में सिनेमाघरों की पच्चीस प्रतिशत सीटें भरी तो दूसरी सप्ताह पचास प्रतिशत. हालांकि भारतीय फिल्मों की लिहाज से इसे बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं माना जा सकता है, लेकिन फॉक्स फिल्म ने भारत में इस फिल्म ने अब तक सबसे ज्यादा कमाई की. कमाई के मामले में इसने फॉक्स की फिल्में स्पाइडर मैन-3 औप कैसिनो-रॉयल को भी पीछे छोड़ दिया. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की सफलता को लेकर भारतीय फिल्मकारों का कहना है कि भारत में ज्यादातर लोग फिल्म स्लमडॉग का मतलब भी नहीं समझते है, यही इस फिल्म के साथ दिक्कत है. दूसरी ये कि अनिल कपूर को छोड़कर इस फिल्म में कोई जाना माना कलाकार नहीं है. तीसरी ये कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला लड़का अंग्रेजी बोलता है ये बात किसी को हजम नहीं हुआ. हालांकि फिल्म का हिंदी संस्करण काफी सफल रहा है.
आलोचकों ने स्लमडॉग को मूल रूप से विदेशी फिल्म करार दिया. रोटेन टोमैटोज ने फिल्म को सौ में से चौरानवे अंक दिया. वहीं मूवी सिटी न्यूज ने साल की तीसरी बड़ी फिल्म बताया. शिकागो सन टाइन्स ने फिल्म को फोर स्टार करार दिया. उसकी समीक्षा कुछ इस प्रकार थी, सांस रोकनेवाली, उत्तेजना भर देने वाली कहानी, दिल को दहला देने वाली. वाल स्ट्रीट जर्नल ने इस फिल्म पहली वैश्विक मास्टरपीस करार दिया है.
भारत में इस फिल्म पर व्यापक और मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. फिल्म समीक्षकों ने इसे खुले दिल स्वीकार किया है. टाइम्स ऑफ इंडिया में निखत काजमी ने लिखा है, परी कथा की तरह, जिसमें थोड़ा रोमांच भी है, साथ ही कलाकाल की अंतर्दृष्टि भी. वे फिल्म के आलोचकों की आलोचना करते हुए लिखते हैं कि धाराबी इर्द-गिर्द के जीवन पर वृतचित्र बनाने को कोई मतलब नहीं है. इंडियाटाइम्स में रेणुका कहती है कि यह फिल्म सचमुच में भारतीय फिल्म है. वे आगे कहती है कि यह मुंबई की जिंदगी पर आधारित और यहीं बनी अब तक सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है.
दूसरी ओर, फिल्म समीक्षक, गौतम भास्करन कहते हैं कि इस फिल्म में कुछ भी भारतीय नहीं है. उन्होंने इस फिल्म को छिछला, संवेदनहीन करार दिया. प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक, सुभाष के झा इसे अतिमहत्वाकांक्षी, मगर निराशाजनक फिल्म बताते हैं. वे कहते हैं कि जिस पटकथा पर यह फिल्म बनी है, उस कथा पर मीरा नायर सलाम बांबे और सत्यजीत राय अपु त्रिलोजी बना चुके हैं. बीबीसी इस फिल्म पर कहता है कि यह भारतीय फिल्मों की नकल है. बीबीसी सलाह देता है कि अगर आप मुंबई की सच्चाई देखना चाहते हैं तो उठा लाइये रामगोपाल वर्मा की सत्या की डीवीडी.
अभिनेता अमीर खान ने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि यह भारतीय फिल्म है. आमिर ने कहा कि सर रिचर्ड एटिनबोरो की गांधी सही मायनों में एकमात्र भारतीय फिल्म थी. उन्होंने कहा कि स्लमडॉग भारत के बारे में है, लेकिन भारतीय फिल्म नहीं है. हमें आशा है कि यह फिल्म ऑस्कर में अच्छा करेगी. हमें नहीं लगता है कि यहां देशी या विदेशी से कुछ लेना-देना है. फिल्मकार प्रियदर्शन कहते हैं कि यह भारतीय व्यवसायिक सिनेमा की तरह है. चूंकि विदेशी लोग हमें गंदा, शोषित देखना पसंद करते हैं, इसमें मुंबई की खूबसूरती कहां है.
साहित्यकार सलमान रश्दी कहते हैं कि वे स्लमडॉग के बड़े फैन नहीं है. फिल्म में तीन-चार जगह स्टोरी लाइन तोड़ी गई है.
पुरस्कार और सम्मान
अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म को खूब वाहवाही मिली. इस फिल्म को चार गोल्डन ग्लोब और ग्यारह बाफ्टा अवोर्ड मिले हैं. इसके साथ ही इसे ऑस्कर अवोर्ड के दस वर्गों में नामांकित किया गया है.
संगीत
स्लमडॉग के लिए संगीत दिया है ए आर रहमान ने. इस फिल्म के लिए रहमान को 2009 का गोल्डन ग्लोब बेस्ट ऑरिजिनल स्कोर अवार्ड मिला है. रहमान को ऑस्कर के तीन वर्गों में भी नामांकित किया गया है. वहीं गुलजार को जय हो के लिए ऑस्कर में नामांकित किया गया है.
फिल्म पर विवाद
छियासीवें गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड की घोषणा के बाद, शिकागो फिल्म समालोचकों ने डैन्नी बॉयल के साथ सह-निर्देशक लवलीन टंडन को भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार देने के लिए ऑनलाइन आंदोलन चलाया. आंदोलनकर्ता जैन लीसा हटनर का कहना है कि जब लवलीन फिल्म निर्माण प्रक्रिया में शामिल हुई तो पुरस्कारों में इन्हें दरकिनार क्यों किया गया. बाद में लवलीन ने कहा कि वे इस तरह के आंदोलन से शर्मिदगी महसूस करती हैं और उन्हें यह पुरस्कार नहीं चाहिए.
इस फिल्म पर मेगास्टार अमिताभ बच्चन की टिप्पणी से भी भारी विवाद खड़ा हुआ. अमिताभ की टिप्पणी कई मायने में महत्वपूर्ण है. चूंकि फिल्म की शुरुआत में अमिताभ द्वारा जमाल को ऑटोग्राफ देते दिखाया जाता है, अमिताभ ही कौन बनेगा करोड़पति के संचालक थे. तेरह जनवरी 2009 को अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर फिल्म के कुछ हिस्से पर भारी ऐतराज जताया. अमिताभ ने कहा, दुनिया में कहां गरीबी, मुखलिसी नहीं है, क्या विकसित देशों के लोग गरीब नहीं है, तो फिर विकासशील भारत की गरीबी को मजाक क्यों बनाया जाता है. आगे उन्होंने कहा कि एक भारतीय की किताब पर एक विदेशी ने फिल्म बनायी इसलिए इस फिल्म को गोल्डन ग्लोब मिल जाता है, अगर किसी विदेशी की ये फिल्म नहीं होती तो इसे यह पुरस्कार नहीं मिलता. अमिताभ की इस टिप्पणी पर भारी विवाद हुआ. बाद में अमिताभ ने अपनी टिप्पणी पर सफाई भी दी.
विरोध और कानूनी पक्ष
फिल्म के रिलीज होने के बाद इसकी व्यापक आलोचना हुआ. कई लोगों ने फिल्म के खिलाफ कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की. फिल्म पर देश की गरीबी को विदेशी नजरिये से देखने और दिखाने का आरोप लगाया गया. स्लम-ड्वेलर्स वेल्फेयर ग्रुप ने फिल्म के संगीतकार ए आर रहमान और अभिनेता अनिल कपूर के खिलाफ मानहानि का दावा भी ठोका. इन पर आरोप लगाया गया कि फिल्म में झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवालों को गलत तरीके से दिखाया गया, जो मानवाधिकार का उल्लंघन है. फिल्म में स्लमडॉग शब्द के इस्तेमाल पर भी ऐतराज जताया गया. सामाजिक कार्यर्ता निकोलस अल्मैदा ने निजी फायदे के लिए गरीबों के शोषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने स्लमडॉग शब्द को गरीबों के लिए अपमानजनक बताया.इस तरह के प्रदर्शन देश के दूसरे भागों में भी हुआ. हिंदू जन जागृति समिति ने फिल्म में राम को दिखाने पर ऐतराज जताया.
बाल कलाकार
स्लमडॉग की सफलता के बाद फिल्मकार मालामाल हो गए. लागत से दस गुना से भी ज्यादा पैसा कमाया. लेकिन इस फिल्म के बाल कलाकार आज भी उसी स्लम में रहते हैं, जहां वे पहले रहते थे. जानकर आश्चर्य होता है कि फिल्म के इन बाल कलाकारों को महज कुछ रुपयों पर फिल्म में काम कराया गया. फिल्म में रूबीना अली(लतिका) और अहरुद्दीन इस्माइल(सलीम) को एक आम मजदूर से महज तीन गुनी मजदूरी दी गई. इस्माइल के घर को स्थानीय अधिकारियों ने गिरा दिया और वो अब प्लाटिक के टेंट में रहता है. इस्माइल टीबी से गस्त है. इस बात तो निर्देशक बॉयल ने भी माना और रूबीना-इस्माइल के लिए एक ट्रस्ट बनाने की बात भी कही, लेकिन ट्रस्ट में कितना पैसा दिया गया, किसी को नहीं मालूम.
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