हिंदी शोध संसार

शनिवार, 24 जनवरी 2009

इजरायल का अस्तित्व

इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है. अपनी आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी इजराइल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. यूं कहे तो इजरायल का अस्तित्व संघर्ष और सिर्फ संघर्ष पर टिका है. उसका आज तक का इतिहास अत्यंत ही रक्त-रंजित रहा है. इसके बावजूद भविष्य शांतिपूर्ण होगा, इसकी सिर्फ शुभकामना ही दी जा सकती है.
इजरायल पश्चिमी एशिया का एक छोटा सा देश है. यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है. इसकी उत्तरी सीमा पर लेबनान, उत्तर-पूर्व में सीरिया, पूर्व में जॉर्डन और दक्षिण-पश्चिम में मिश्र स्थित है. क्षेत्रफल के हिसाब छोटा होने के बावजूद इजरायल काफी विविधतओं भरा देश है. पश्चिमी तट और गजा पट्टी इजरायल से सटा हुआ है.
इजरायल की आबादी बहत्तर लाख अस्सी हजार है. इनमें यहूदी बहुसंख्यक हैं. इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है. यहूदी के अलावा यहां अरबी मुस्लिम, ईसाई और अन्य जातियां भी रहती हैं.
आधुनिक इजरायल प्राचीनकाल के यहूदी भूमि की परिकल्पना पर आधारित है. कभी समूचा इयरायल यहूदी धर्मावलंबियों का देश माना जाता था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रसंघ ने यहूदियों के लिए एक अलग देश के रूप में इजरायल के गठन के ब्रिटेन के प्रस्ताव को मान्यता दे दी. 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के विभाजन को मंजूरी दे दी. जिसके तहत यहूदियों और अरबों के लिए अलग राज्य को मंजूरी दे दी. 14 मई 1948 को यहूदी बहुल राज्य इजरायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इजरायल के इस घोषणा को आस-पास के अरब राष्ट्रों ने मानने से इनकार कर दिया और इजरायल के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
इजरायल ने अरब राष्ट्रों के साथ एक ही समय कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा और सभी युद्धों में जीत हासिल की. इस जीत ने अलग इजरायल की स्वतंत्रता को पुख्ता कर दिया. इतना ही नहीं, इस जीत के बाद इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के बाहर भी अपनी सीमा का विस्तार किया. इसके बाद से इजरायल को अपने पड़ोसी अरब देशों से लगातार संघर्ष करना पड़ा. ये संघर्ष बड़े युद्धों और रक्तपात के अंतहीन सिलसिले के रूप में सामने आया और आज भी जारी है.
सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इजयराल की स्थापना और उसका अस्तित्व संघर्षों पर ही टिका है. इजरायल ने मिश्र और जॉर्डन के साथ कई शांति-संधि भी किए, लेकिन शांति के ये प्रयास इजरायल और फिलीस्तीनियों में दीर्घकालीन शांति
लाने में नाकामयाब रहे.
इजरायल में संसदीय शासन व्यवस्था है. प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है. सकलू घरेलू उत्पाद के हिसाब से इजरायल दुनिया का चौवालिसवां सबसे बड़ा देश है. मानव विकास सूचकांक, प्रेस की स्वतंत्रताऔर आर्थिक प्रतिस्पर्धा के हिसाब से मध्यपूर्व के देशों में इजरायल का स्थान सबसे ऊपर है. देश का सबसे बड़ा शहर येरूसलम इसकी राजधानी है, जबकि तेल अवीव इसकी वित्तीय राजधानी है.
इतिहास
इजरायल ईसापूर्व से ही यहूदियों की पवित्र भूमि मानी जाती है. प्राचीन मान्यता के अनुसार, ईश्वर ने तीन यहूदियों को रहने के लिए ये धरती दी थी. विद्वान मानते हैं कि यह समय ईसा पूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी की हो सकती है. यहूदी परंपरा के मुताबिक ईसापूर्व ग्यारहवी सदी में इस भूमि पर इजरायली साम्राज्य स्थापित हुआ था और इन शासकों ने करीब एक हजार साल तक इजराइल पर शासन किया था. इजरायल के ये स्थल यहूदियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है.
इजरायली साम्राज्य और सातवीं शताब्दी में इस्लामी विजय के मध्य इजरायल पर सीरिया, बेबीलोनिया, पर्सिया, ग्रीक, रोम, ससेनिया और बायजेनटाइन का शासन रहा. 132 ईस्वी में रोमन साम्राज्य के खिलाफ बार कोखबा विद्रोह की असफलता के बाद इस क्षेत्र में यहूदियों की उपस्थिति घट गई. यहूदियों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. 628-29 ईस्वी में बायजेनटाइन शासक हेराक्ल्यूस ने वृहत पैमाने पर यहूदियों का संहार किया, जिसके कारण यहूदियों को वहां से भागना पड़ा. इस घटना के बाद यहां यहूदियों की संख्या नगण्य हो गई. 1260 में इजरायल मामलुक सल्तनत का हिस्सा बन गया और 1516 में यह ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया, जिसने बीसवीं सदी तक इस क्षेत्र पर शासन किया.
इजरायलियों को करीब पंद्रह सौ सालों तक अपनी जमीन से अलग रहना पड़ा, लेकिन सांस्कृतिक एकता ने इनके दिलों में मातृभूमि के प्रति प्रेम की लौ को जलाये रखा. बाइबिल और यहूदी प्रार्थना पुस्तिका ने इनकी आशा और विश्वास को बरकरार रखा. बारहवीं सदी की शुरुआत में कैथोलिक ईसाईयों की प्रताड़ना से पीड़ित होकर यहूदी एकबार फिर इजरायल लौटने लगे. 1492 में स्पेन ने यहूदियों को खदेड़ दिया. सोलहवी शताब्दी में इजरायल चार शहरों में यहूदियों ने जड़ें जमा ली और अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारी संख्या में लोग इजरायल में आ बसे.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यहूदियों ने एक अलग यहूदी राष्ट्र की मांग शुरू कर दी. 1896 में हर्जल ने अपनी किताब द जेविस स्टेट में भावी यहूदी राष्ट्र की रूप रेखा रखी. अगले ही साल वर्ल्ड जियोनिस्ट कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता हर्जल ने की.
1904-14 के दौरान करीब चालीस हजार यहूदी फिलीस्तीन में आकर बस गए. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के विदेशमंत्री आर्थर बलफोर ने एक घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बलफोर घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है. इस घोषणा पत्र में फिलीस्तीन के अंदर एक यहूदी राष्ट्र की बात कही गई थी. इस घोषणा पत्र में ये बात भी शामिल की गई कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जाए जिससे फिलीस्तीन में यहूदियों के नागरिक अधिकारों के खिलाफ हो, चाहे यहूदी दुनिया के किसी भी भाग में भी क्यों न हो. यहूदी स्वयंसेवकों की मदद से जेविस लीगन नाम से सेना की बटालियन बनी, जिसने फिलीस्तीन को जीतने में ब्रिटिश सेना की मदद की. इसका अरबों ने विरोध किया और 1920 का फिलीस्तीन युद्ध हुआ.
1922 लीग ऑफ नेशन्स ने बलफोर घोषणा पत्र से मिलते जुलते ब्रिटेन के एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस क्षेत्र में अरब मुस्लिमों की आबादी ज्यादा थी, लेकिन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर येरूसलम यहूदी बहुल था. इधर, यहूदियों का फिलीस्तीन आना जारी रहा और फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी एक लाख हो गई. 1930 में नाजीवाद के उदय के कारण यूरोप से भारी संख्या में यहूदियों का पलायन हुआ और फिलीस्तीन में यहूदियों की संख्या बढ़कर ढाई लाख से भी ज्यादा हो गई. यहूदियों आबादी के विस्तार ने 1936-39 के अरब क्रांति को जन्म दिया. इधर, दुनियाभर में यहूदियों के संहार का सिलसिला जारी रहा. द्वितीय विश्व आते-आते फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी बढ़कर तैंतीस प्रतिशत तक आ पहुंची.
इजरायल की आजादी
1945 के बाद ब्रिटेन का यहूदियों का साथ मतभेद बढ़ गया. 1947 में ब्रिटेन ने यह कहकर फिलीस्तीन शासनादेश को वापस ले लिया कि वह अरबों और यहूदियों के बीच सर्वसम्मत हल निकालने में नाकामयाब रहा. नवगठित संयुक्त राष्ट्र संघ ने 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र विभाजन प्रस्ताव(संयुक्त राष्ट्र आमसभा प्रस्ताव 181) को मंजूरी दे दी और इस प्रकार अरब और यहूदियों के लिए दो राष्ट्रों ने निर्माण हुआ. इस प्रस्ताव के तहत संघर्ष रोकने के लिए येरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय शहर घोषित कर दिया गया और स्वयं संयुक्त राष्ट्र ने इसके प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल ली. इस प्रस्ताव को अरब लीग और अरब उच्च समिति ने खारिज कर दिया. एक दिसंबर, 1947 से अरब उच्च समिति ने तीन दिवसीय हड़ताल शुरू की और अरब लड़ाकाओं नें यहूदियों पर हमला कर दिया. यहूदियों ने भी रक्षात्मक रुख अपनाया और अरबों को जवाब देना शुरू किया. इस तरह यहां गृहयुद्ध भड़क उठा. इस गृहयुद्ध की वजह से फिलीस्तीन-अरब अर्थव्यवस्था ढह गई और फिलीस्तीन-अरब को भागना पड़ा.
14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इधर, मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इराक ने एक साथ इजरायल पर हमला कर दिया. इस युद्ध को 1948 का अरब-इजरायल युद्ध के नाम से भी जाना जाता है. इस युद्ध में अरब देशों की सहायता के लिए मोरक्को, सूडान, यमन और सऊदी अरब ने भी अपने सैनिक भेजे. यह युद्ध एक साल तक चला. और अंत में युद्धविराम की घोषणा हुई. ग्रीन-लाइन के नाम के अस्थायी सीमा रेखा पर सहमति बनी. अलग जॉर्डन को पश्चिम तट और गजा नाम दिया गया. गजा पट्टी पर मिस्र ने नियंत्रण कर लिया. 11 मई, 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल को अपनी सदस्यता प्रदान की. संघर्ष के दौरान अस्सी प्रतिशत अरब आबादी (7,11,000) को वहां से भागना पड़ा. इस समय फिलीस्तीन शरणार्थी की समस्या इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष की मुख्य वजह माना जा रहा है.
अरब देशों ने इजरायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया और इजरायल को नष्ट करने का आह्वान किया. 1967 में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेना इजरायली सीमा पर पहुंच गई. और संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों को वहां से भगा दिया. साथ ही, उन्होंने लालसागर तक इजरायल की आवाजाही पर रोक लगा दी. इजरायल ने अरबों के इस कार्रवाई का जवाब दिया और छह दिनों तक चले युद्ध में उसे निर्णायक जीत मिली. उसने पश्चिमतट, गजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप और गोलन की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया. 1949 में ग्रीन लाईन इजरायल और विजित क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा बन गयी. पूर्व येरूसलम के साथ येरूसलम की सीमा में भी विस्तार हुआ. 1980 में पारित येरूसलम कानून ने इस सीमा को मंजूरी दे दी, जिसने येरूसलम की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया.
1967 के युद्ध में अरबों की हार ने अरब में गैर-सरकारी तत्वों के संघर्ष को बढ़ावा दिया. फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ने तो हथियार बंद संघर्ष को ही आजादी का एकमात्र रास्ता करार दिया. साठ के दशक के शुरू और सत्तर के दशक के अंत में फिलीस्तीनियों ने इजरायलियों के खिलाफ दुनियाभर में श्रृंखलाबद्ध हमले किये. 1972 के ग्रीमकालीन ओलंपिक में इजरायली खिलाड़ियों का संहार इसमें शामिल है. उधर, इजरायल ने भी इन हमलों का जवाब दिया.
1977 के संसदीय चुनाव के बाद मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल सादत ने इजरायली संसद में भाषण देते हुए कहा कि अरब देश इजरायल को पहलीबार मान्यता दे रहे हैं. बाद में एक समझौते के मुताबिक इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप से सेना हटा लिया और ग्रीन लाइन के पार फिलीस्तीन की स्वायत्ता पर बाचीत के लिए तैयार हो गया. हालांकि फिलीस्तीन की स्वायत्तता पर कभी बातचीत नहीं हो पाई. सरकारों ने इजरायलियों को पश्चिमी तट में बसाना शुरू किया, जिसकी वजह से फिर संघर्ष शुरू हो गया.
7 जून 1981 को इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हमला कर दिया. इसकी वजह इजरायल का वो खुफिया रिपोर्ट है जिसमें इराक द्वारा परमाणु बम विकसित करने और इजरायल के खिलाफ प्रयोग करने की बात कही गई थी. 1982 में इजरायल ने लेबनान के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करते हुए कई युद्ध शिविरों को नष्ट कर दिया, जहां से फिलीस्तीनी लड़ाके इजरायल पर मिसाईल से हमले करते थे.
1987 में फिलीस्तीनियों ने एकबार फिर हिंसा भड़क उठी. छह साल तक चले इस युद्ध में एक हजार लोग मारे गए.
1993 में इजरायल की ओर से शिमॉन पैरेस और फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन की ओर से महमूद अब्बास ने ओस्लो संधि पर हस्ताक्षर किया. इस संधि ने फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकरण को पश्चिमी तट और गजा पट्टी पर स्व-शासन का अधिकार दिया. इस संधि का मकसद आतंकवाद को खत्म करना था. 1994 में इजरायल-जॉर्डन संधि अस्तित्व में आया जिसके तहत जॉर्डन ने इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया. ये संधि दोनों पक्ष के लोगों को स्वीकार था. लेकिन 1995 में यहूदियों के नेता यित्जिहाक रबिन की हत्या ने शांति संधि को नुकसान पहुंचाया.
1990 के अंत में इजरायल ने बेंजामिन नेतनयाहु की अगुवाई में हेब्रॉन से अपना सैनिक हटा लिया और फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकारण को शासन का अधिकार दे दिया.
1991 में प्रधानमंत्री यहुद बराक ने दक्षिणी लेबनान से सैन्य वापसी कर नए युग की शुरुआत की. बाद में भी उन्होंने फिलीस्तीन प्राधिकरण के अध्यक्ष यासर यराफात से बातचीत जारी रखी. जुलाई 2000 में कैंप डैविड में यासर अराफात और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के बीच हो रहे सम्मेलन में बराक ने फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना का प्रस्ताव दिया, जिसे अराफात ने नामंजूर कर दिया और इस तरह बातचीत भंग हो गई.
2001 में एरियल शैरॉन नए प्रधानमंत्री बने. शैरॉन ने गजा पट्टी से एकतरफा अपने सैनिकों को हटा लिया. मगर 2006 में हृदयाघात से वे कॉमा में चले गए और सत्ता यहुद ओल्मर्ट को सौंप दिया..
नवीन घटनाचक्र
जुलाई 2006 में हिजबुल्ला लड़ाकाओं ने इजरायल पर मिसाइल से हमले किए और दो इजरायलियों का अपहरण कर लिया. इससे द्वितीय लेबनान युद्ध भड़क उठा और लड़ाई महीने भर चली.
नवंबर 2007 में इजराइली प्रधानमंत्री यहुद ऑल्मर्ट और फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए राजी हो गए और दोनों ने संघर्ष विराम कर दिया.
मगर, दिसंबर 2008 के अंत में हमास ने युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए गजा पट्टी से इजरायल पर मिसाइल से हमले शुरू कर दिए. इजराइल ने भी जवाबी हमले किए. अठारह दिनों तक चले इस युद्ध में कम से कम ग्यारह सौ लोग मारे गए, जबकि कोई पांच हजार घायल हुए. गजा पट्टी में ढाई लाख मकान ध्वस्त हो गए.




बुधवार, 14 जनवरी 2009

सत्यम के बहाने


2004 में एक अमेरिकी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ओसामा के अलावा एक और शख्स से डरता है, वो है रामलिंगा राजू . वहीं, रामलिंगा राजू, जिसकी कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स का झंडा आईटी जगत में शान से लहराता था, आज उसके सितारे गर्दिश में है. अमेरिका को डराने वाले शख्स का ऐसा हश्र होगा, इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी.
एक अमेरिकी विश्वविद्यालय से प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लेने वाले रामलिंग राजू ने अमेरिकी कुशल कामगारों की नींद हराम कर दी थी. उन्होंने उनके काम को हथिया लिया और वो काम भारतीय कामगारों तक पहुंचाया. विजन-2020 के रोल मॉडल बन गए. आम भारतीय को मोटी तनख्वाह और आरामपसंद जिंदगी का सपना दिखाया. उनकी कंपनी सत्यम में नौकरी पाने वाले अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझते थे. सत्यम से जुड़ने वाले शख्स की सामाजिक हैसियत खुद-ब-खुद बढ़ जाती थी.
कभी अमेरिकी कंपनियों के लिए चुनौती पेश करने वाली आईटी कंपनी सत्यम आज पूरी दुनिया के लिए खलनायक बन बनी है. इसने करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. 1987 से सफर की शुरुआत करने के बाद सत्यम जल्द ही देश की चौथी सबसे बड़ी आईटी कंपनी बन गई. इस तरक्की से दुनियाभर के आईटी दिग्गजरों की आंखें चौंधिया गई और लोग सत्यम का गुणगान करने लगे. लेकिन इस तरक्की का राज सात जनवरी 2009 को लोगों के सामने आ गया. जब कंपनी के संस्थापक और चैयरमैन राजू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. निदेशकमंडल और सेबी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि वर्षों से कंपनी की वित्तीय हालत खराब चल रही है. बाजार में कंपनी का रुतबा कायम रखने के लिए साल-दर-साल उन्होंने कंपनी को मुनाफे में दिखाया. जिसके लिए कंपनी के खातों में हेर-फेर की गई. उधर, कंपनी के शेयर में प्रोमोटरों की हिस्सेदारी लगातार घटती चली गई. जिसकी वजह से कंपनी का राज खुलने का खतरा पैदा हो गया. और इससे बचने के लिए उन्होंने अपने पुत्र की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया. उन्होंने कहा कि सत्यम को संकट से उबारने के लिए उन्होंने हरसंभव प्रयास किया, लेकिन उनके तमाम प्रयासों के बावजूद सत्यम की हालत लगातार बिगड़ती चली गई. राजू ने कहा,
"यह बाघ की सवारी करने जैसा है, यह जाने बगैर कि उसका आहार बनने से कैसे बचा जाय"
उन्होंने लिखा कि वो गुनहगार है, खुद को कानून के हवाले करने के लिए तैयार हैं और अब वो हर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं. इसके बाद जो कुछ हुआ सबके सामने है.
सत्यम के निदेशकमंडल और सेबी को इस आशय का पत्र लिखते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. जिस समय उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, उस वक्त(सात जनवरी, समय-11.30 बजे) सत्यम के एक शेयर की कीमत 188 रुपये थी. लेकिन शाम तक इसकी कीमत घटकर चालीस रुपये रह गई. दूसरे दिन यह कीमत 6.25 पैसे के न्यूनतम स्तर पर आ गई. इससे कंपनी में निवेशकों को करीब दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ. कंपनी की हालत सबके सामने है. कंपनी पर से निवेशकों का भरोसा उठ गया. उनके कर्मचारियों को सड़क पर आने का डर सताने लगा है. उधर, विप्रो और इंफोसिस जैसे कंपनियों के खातों का हिसाब रखने वाली एजेंसी केपीएमजी का कहना है कि कंपनी में हुए इस घोटाले के लिए अकेले रामलिंग राजू जिम्मेदार नहीं हैं, कंपनी के मुख्यकार्यकारी अधिकारी रिचर्य रेकी ने कहा कि यह सब तर्क से परे है. कोई नहीं कह सकता है कि इस पत्र में जो कुछ लिखा गया है, वह सबका सब सही ही है. अभी इस बात पर भरोसा करना सही नहीं होगा कि जो कुछ भी हुआ उसके लिए अकेले राजू जिम्मेदार है. बल्कि खातों के संचालन से जुड़े तमाम लोगों को सामने लाने की जरूरत है.
दरअसल कंपनी के साथ परेशानी उस वक्त शुरू हुई जब सोलह दिसंबर 2008 को सत्यम कंप्यूटर्स के निदेशकमंडल ने एक मीटिंग बुलाई गई और बैठक में रामलिंग राजू के बेटों की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास इंफ्रास्ट्रेक्चर और मेटास प्रोपर्टीज के अधिग्रहण का प्रस्ताव पारित किया. इस अधिग्रहण के पीछे तर्क दिया गया कि
मंदी के इस दौर में वर्तमान विकासदर बनाए रखना नामुमकिन है.
विदेशी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा में आई गिरावट से भारी दबाव पैदा हुआ है.
बाजार के जिन क्षेत्रों में अब तक विकास देखा जा रहा है, वो मंदी की मार से बुरी तरह प्रभावित हैं.
साथ ही, आउट-सोर्सिंग को लेकर अमेरिकी सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उससे आने वाले समय में परेशानी और भी बढ़ सकती है. ऐसे में आईटी के अलावा बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, आदि क्षेत्रों में निवेश करके कंपनी के विकास दर को बरकरार रखा जा सकता है.
बैठक में बताया गया कि भारत अगले पांच सालों में अपने बुनियादी ढांचों पर पांच सौ बिलियन डॉलर, जबकि चीन साढ़े सात सौ बिलियन डॉलर खर्च करेगा. इस लिहाज से बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश करना फायदेमंद सौदा साबित हो सकती है.
इन्हीं सब तर्कों के साथ सत्यम निदेशकमंडल ने 7914.10 करोड़ रुपये में मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया.
पहले ही मंदी की मार से जूझ रियल स्टेट में निवेश करना सत्यम के निवेशकों को नागवार गुजरा और उन्होंने सत्यम निदेशकमंडल मंडल के इस फैसले का विरोध किया. वाकई लोगों को आश्चर्य हुआ कि आखिर सत्यम ने रियल स्टेट क्षेत्र में कूदने का फैसला क्यों किया. फैसले पर इस बात को लेकर भी ऐतराज था कि आखिर सत्यम के चेयरमैन राजू के बेटे की कंपनी में ही निवेश का फैसला क्यों किया गया.
इसका जवाब राजू ने अपने पत्र में दिया कि सत्यम को खास्ताहाली से उबारने के लिए उन्होंने ऐसा किया. मेटास के अधिग्रहण से कंपनी को जो फायदा होता उससे वह अपने घाटे की भरपाई करती और मेटास की देनदारी से बाद में निपटती. लेकिन निवेशकों के विरोध ने सारा गुड़ गोबर कर दिया. और अधिग्रहण का फैसला टालना पड़ा. पूरे मामले में किरकिरी झेल रहे राजू ने आखिरकार सच को सामने लाने का फैसला किया.
सच सामने आते ही सत्यम पर शिकंजा कसने लगा. सत्यम को जेल की हवा खानी पड़ी. सेबी ने सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. उधर, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में भी सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. सत्यम पर दर्जनों मामले दर्ज कराए गए. सरकार ने सत्यम के कामकाज की देखभाल के लिए तीन सदस्यीय समिति बना डाली. समिति ने अपना कामकाज भी शुरू कर दिया.
उधर, सत्यम के खातों की जांच की जिम्मेदारी एसएफआईओ(सीरियस फ्रॉड इन्वस्टीगेशन ऑफिस) को सौंप दी गई है. विभाग को तीन माह में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है. यानी जब तक रिपोर्ट आएगी सरकार लोकसभा चुनाव में पूरी तरह उलझी रहेगी. पूरे रिपोर्ट का क्या हश्र होना है, एक सामान्य प्रबुद्ध नागरिक जरूर जानता है. केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार है, वह सत्यम और राजू को बचाने के लिए पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है. तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकार को कर्मचारियों के हितों की चिंता है. यानी सरकार हर महीने 520 करोड़ रुपये के हिसाब से तीन महीने तक कर्मचारियों को सेलरी देगी. देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हैं, लाखों लोग रोज सड़कों पर आ रहे हैं, सरकार को इन लोगों की चिंता क्यों नहीं है. आखिर सत्यम के उन कर्मचारियों की चिंता सरकार को क्यों सताने लगी जो कम से कम पचास हजार रुपये माहवारी वेतन पाते रहे हैं. क्या इसलिए कि वो आरामपसंद जिंदगी जीने के आदि हो चुके हैं और अब मुखलिसी की जिंदगी नहीं जी सकते. उसे बिहार में फंसे चालीस लाख लोंगों की चिंता क्यों नहीं सतायी तो पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं. उस समय 1000 करोड़ रुपये की घोषणा करने के लिए प्रधानमंत्री को हवाई सर्वेक्षण करना पड़ा, लालू और रामविलास से वोट के गणित सुलझाने पड़े और आज दो हजार करोड़ रुपये देने में थोड़ी भी हिचक नहीं आ रही है.
हमें भी ये भी पता है कि सरकार ने उन पैसों पर भी टैक्स लिया है, जिसे सत्यम ने कभी कमाया ही नहीं, आखिर, सरकार अब तक कहां सोती रही. उसे क्यों नहीं पता चला कि सत्यम के लाभ का चिट्ठा पूरी तरह झूठ का पुलिंदा है. वह और कब तक सोती रहेगी. आर्थिक विकास के आंकड़ों में वह जनता को कब तक ठगती रहेगी. वह उद्योग घरानों के खातों की क्यों नहीं जांच करवाती है. शायद सरकार भी जानती है कि वह जिन लोगों से जांच करवाएगी वो लोग अपनी क्षमता से कम और उपहारों से ज्यादा खुश होते हैं. जो बैंकर गरीब किसानों से ऋण वसूली के लिए हर हथकंडा अपनाने से नहीं चूकते वो सत्यम को सालों-साल गलत इंट्री कैसे देते रहे. अब भी सुधरने का वक्त है. विकास के आंकड़ों से बाहर निकलकर ठोस धरातल पर कुछ करने की जरूरत है.

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

सफ़ेद हाथी

मीडिया इतना शोर-शराबा मचायेगी तो हमारी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जायेगी। हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तरह बर्बाद हो जायेगी।
आईटी कंपनी सत्यम के डूबने के बाद कई विशेषज्ञों का मानना था कि सरकार मीडिया की खबरों को सेंसर करे, सरकार उस पर रोक लगाये। किसी ने ठीक ही कहा है कि सरकार तब चैन की नींद सोती है जब मीडिया वाले ख़बरों की जगह राखी सावंत का नाच, राजू श्रीवास्तव के हंसगुल्ले, आमिर की गजनी और शाहरुख़ की रब ने बनाई जोड़ी को चौबीसों घंटे दिखाती है।
जब कभी मीडिया मुंबई हमले के बाद लोगों के आक्रोश को दिखाती है तो सरकारी फरमान आ जाता है कि लोगों को डराना बंद करो नही तो तुम पर कार्रवाई की जायेगी। यानी टीवी वालों का लिंक कट दिया जाएगा। उसकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।
आखिर क्या करे टीवी वाला।
वह कभी लोगों से सच दिखाने का दावा करता है, कभी सोचने के लिए मजबूर करता है, कभी आपको आगे रखने का दावा करता है। इन्हीं घनचक्कर शब्दों के चक्कर में वह कभी कुछ दिखने की कोशिश करती है तो सरकारी फरमान उसको मजबूर करती है कि तुम रब ने बनाई जोड़ी, गजिनी का प्रमोशन दिखाओ और दिखाते रहो। तुम भी चैन से सो जाओ और हमें भी सोने दो।
टीवी चैनल वालों के लिए भी अच्छा है। न्यूज़ के नाम पर फ़िल्म का प्रमोशन दिखाकर पैसे कमाना उसके लिए उसके लिए आसन हो गया है। विज्ञापन प्रसारण के लिए उसे पैसे भी नही खर्च करना पड़ता है और कमी भी जबरदस्त हो जाती है।
दरअसल सरकार भी यही चाहती है। आज सत्यम कंपनी ने अपने निवेशकों को दिवालिया कर दिया। खुद कितनी दिवालिया हुई वह तो पीछे की बात है। सत्यम में पाँच हज़ार से दस हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले की बात सामने आ रही है। कंपनी ने हाल के दिनों में जो भी लेनदारी-देनदारी, मुनाफा दिखाया वह सब झूठ था सब फरेब था। किसी और का नहीं, ख़ुद कंपनी के करता-धरता रामालिंगम राजू का कहना है। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है राजू की गिरफ्तारी भी हो सकती है।
इतना सब कुछ होने के बाद भी मीडिया अगर कुछ दिखा रही है तो साहेब लोगों का कहना है की सरकार को इस पर रोक लगना चाहिए नहीं तो देश की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह बिखर जायेगी।
दरअसल पैसे वाले यही चाहते है की मीडिया, लाल-फीताशाही और पेज थ्री की खबरें ही दिखाए। ज्योही उनकी हेरा-फेरी, उनकी बेईमानी, मक्कारी की ख़बर दिखने की बात होती है, उसपर सेंसर की बात कही जाने लगती है। तभी तो देश की अर्थव्यवस्था का हवाला देकर देश के सबसे बड़े कारपोरेट घोटाले की ख़बर को दिखाने पर पाबन्दी की बात कही गई।
देश में किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है। सरकार ने किसानों की हालत सुधारने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। लोकसभा चुनाव को करीब देखते हुए किसानों के हाथ कर्जमाफी का झुनझुना थमा दिया और कहा इसे तब तक बजाते रहो जब तक कोई अगली सरकार हम्हारे कर्जो को माफ़ करने के लिए तैयार न हो जाए। जब तक झुनझुना बाजते रहो ठीक है, अगर सरकार की इस नाकामी को दिखने की कोशिश की तो लिंक काट दिया जाएगा, क्योंकि हम सरकार हैं।

बुधवार, 7 जनवरी 2009

क्या करोगे अजहर मसूद का?

प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक मंच से घोषणा कर दी है कि मुंबई आतंकी हमलों में पाकिस्तान के ना सिर्फ़ नॉन-स्टेट ऐक्टर जिम्मेदार हैं, बल्कि इन हमलों में पाकिस्तान का सरकारी अमला भी जिम्मेदार है। ये बात एकाएक किसी प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं कही गई है बल्कि पूरी जाँच और सबूत इकट्ठा करने के बाद कही गई है। अब पाकिस्तान पर यह निर्भर है कि वह क्या करता है। एक तो वह वह भारत के सबूतों को ग़लत कहकर खारिज कर देगा, दूसरा वह इस पर कार्रवाई करेगा। उसकी कार्रवाई दो रूपों में हो सकती है। एक तो वह खुद उन दहशतगर्दों के खिलाफ कार्रवाई करेगा या भारत जिन आतंकवादियों कि मांग कर रहा है, वह उसे भारत को सौप देगा।
अब यहाँ भारत के हक़ में है कि वह पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाकर उसे खुद कार्रवाई के लिए मजबूर करे। आतकवादियों को भारत को सौपे जाने की जिद भारत न करे इसी में भारत का फायदा है। भारत में राजनितिक हालत जितने गंदे हो जाए हैं। उसमे किसी भी स्थिति में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकेगी। भ्रष्टाचार को छोड़ भी दे तो यहाँ अलाप्संख्यक वोट बैंक की राजनीती इतनी गन्दी हो चुकी है, किसी भी सूरत में आतंकियों को सजा नहीं दिलाई जा सकती है।
मुलायम सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को फटकार की घूंटी पिला चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है की सीबीआई जैसी संस्थाएं भी राजनितिक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रही है।
सरकार पर जन दबाव है। जन दबाव का ही नतीजा है की वह पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बोलने का हिम्मत जुटा पा रही है। लेकिन क्या वह आतंकवादियों को भारत हो सौंपे जाने के बाद भी इतनी ही हिम्मत रख सकेगी। इसका सीधा सा जवाब है कभी नहीं।
माना भारत की अदालतों ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर भी दिया तो क्या भारत सरकार उस सजा को लागू करवा पाएगी। यहाँ भी जवाब मिलेगा बिल्कुल नहीं।
जो सरकार प्रति आतंकवाद खड़ा कर सकती है, पहले सिख, फिर मुस्लमान और फिर हिन्दू को आतंकवादी बना सकती है, वो आतंकवाद के खिलाफ खड़ी होने का हिम्मत कैसे कर सकती है। उदाअहरण सामने है, सुप्रीम कोर्ट चार साल पहले अफज़ल गुरु को मौत की सजा सुना चुकी है। मौत की सजा पर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर चुकी है। ऐसे आतंकवादी को वह संरक्षण देकर जिन्दा रखे हुए है, वह पाकिस्तान से लाये आतंकवादी को सजा कैसे दिलवा पायेगी।
दो रोज पहले सरकार ने एक विधेयक पारित कराया है। जिसके तहत सात साल से कम सजा पाने वाले आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। एक तरफ़ गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून है तो दूसरी तरफ़ ये कानून जहाँ अपराध की पूरी छोट है। ऐसे में आतकवाद के खिलाफ लड़ने की बात बेईमानी है।