हिंदी शोध संसार

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

लोग नहीं रखेंगे याद


मुंबई में छब्बीस तारीख की रात क्या हुआ, कहने की जरूरत नहीं है. मैं पूरी रात टेलीविजन चैनल बदलता रहा. टेलीविजन चैनलों ने इसे देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला करार दिया. हताहतों की संख्या के हिसाब से देखें तो यह हमला देश में हुए कई अन्य हमलों से छोटा है, लेकिन यह हमला जितना जटिल है, जितने लंबे देर तक चला है(अभी जारी है), इसे देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला कहा जाना गैर-मुनासिब नहीं है. सबसे अहम बात अभी मिली जानकारी के मुताबिक, पुलिस के ग्यारह मारे जा चुके हैं. इनमें मुंबई एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे, एक एसीपी और एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट शामिल हैं. खबरों में मुताबिक नौ सेना का एक जवान भीमारा गया है. ऑपरेशन में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के 200 कमांडो, थल सेना और नौ सेना के जवान, ब्लैक कमांडो, मुंबई पुलिस जुटा हुआ है. ताज होटल, ट्रिडेंट होटल, ओबराय होटल में फंसे पर्यटकों और विदेशी अधिकारियों को निकाला जा रहा है. पिछले बारह घंटे से लगातार ऑपरेशन जारी है. कब खत्म होगा कहा नहीं जा सकता है.


कहा जा रहा है कि एक दर्जन से ज्यादा आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए. एक तिकड़मी टेलीविजन चैनल, जिसे खबरें ज्यादातर सूत्रों से ही मिलती है, ने बार-बार कहा है कि आतंकवादी गुजरात से आए हैं. उस चैनल के सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार ने उसे बहुत सी जानकारी दी है, लेकिन ये जानकारी चैनलों के माध्यम से आतंकवादी तक नहीं पहुंच जाएं, इसलिए वह इन्हें अपने चैनल पर नहीं दिखा सकता है. हालांकि कई चैनलों ने लगातार बड़ी ही शिद्दत से पल-पल की जानकारी दी, सही जानकारी देने की हर संभव कोशिश की. आईबीएन-7 का पत्रकार तो मानों रो-रोकर जानकारी दे रहा हो.


होटलों, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल और सड़कों पर कहीं चीख पुकार थी, तो कहीं कराह. कुल मिलाकर एक जबरदस्त सन्नाटा.
इन सबके बीच चैनलों पर शहीदों के गुनगान में कसीदे पढ़े जाने लगे. कहा जाने लगा कि इन शहीदों को हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा, यानी हमेशा याद रखेगा. लेकिन पश्चिमी इतिहासकारों का ये आरोप कि हिंदुस्तानी कभी अच्छे इतिहासकार नहीं रहे हैं, क्योंकि वे भुलक्कड़ होते हैं. हम हिंदुस्तानी इस कथ्य पर भले ही विदेशियों को गाली दें, लेकिन गंभीरतापूर्वक सोंचे तो वह कहीं न कहीं सच कह रहे होते हैं. सच है कि हम बड़ी से बड़ी घटना, बड़े से बड़े दर्द, बड़े से बड़े अपमान, बड़ी से बड़ी जिल्लत, बड़ी से बड़ी मार को भूलने के आदि होते हैं. ऐसे में ये कहा जाए कि इन शहीदों को देश कभी नहीं भूलेगा. ये उनकी शहादत को गाली देना है. वो व्यक्ति जब तक जिंदा था, जो हुआ पाप पुण्य किया. अब उसके जाने के बाद तो उसे गाली नहीं दें, लेकिन हमारी फितरत है कि हम इसके आदि हैं.


मुठभेड़ जारी है, तब तक हम थोड़े संजीदा हैं. हालांकि बेशर्मों, पतितों और कुकर्मियों का इक्का-दुक्का बयान आना शुरू हो गया है. भौं-तरेर चिरकुच ने कह दिया है कि राज्य सरकार को तमाम सरकारी इमदाद मुहैया करायी जा रही है, जिसकी उसे जरूरत है. तिकड़मी चैनल का जाल बिछना शुरू हो गया है. उसने बता दिया है कि आतंकवादी गुजरात से आएं है. उसके पास बहुत सी जानकारी है, जिसे केंद्र सरकार ने उसे मुहैया कराया है, वो भी सूत्रों के जरिए. मुठभेड़ को खत्म होते ही वह इस गुप्तज्ञान का प्रचार प्रसार करेगा. इस ज्ञान में कुछ बातें इस तरह की है-
पहला, तो इसे विदेशी हमला करार दिया जाएगा.
दूसरा, इसे अंडरवर्ल्ड की सांठगांठ बताया जाएगा.
तीसरा, इसमें हिंदू आतंकवादियों(इस तिकड़मी चैनल और कांग्रेस की हालिया खोज) के शामिल रहने की बात कही जाएगी.
चौथा, गुजरात सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाएगा.


और भी कई बातें हो सकती हैं, जिसे उद्घाटन तो यही चैनल करेगा.


मुठभेड़ के खत्म होते ही, बेशर्मों, कथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों, लाल सलाम ब्रिगेड आदि की बेशर्म बयानबाजी शुरू हो जाएगी. भगवा ब्रिगेड को ओर से पोटा जैसे कड़े कानून की मांग होगी. जिसे लात मारे कुत्ते की कांय-कांय समझकर खारिज कर दिया जाएगा. नए सिरे से हिंदू आतंकवादियों की खोज की जाएगी. उन्हें परेशान किया जाएगा, यातनाएं दी जाएगी. फिर कहां याद रहेंगे ये शहीद. और आखिर हिंदुस्तान उन्हें क्यों याद रखेगा.

पचास हजार में बनते हैं ईसाई

पचास हजार में बनते हैं ईसाई, सहारा समय पर पढ़े ये सनसनीखेज रिपोर्ट

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

चर्च का झूठ

लेखक-आर एस फ्रांसिस

जी हां यह सच है कि धर्मांतंरण के मामले पर `चर्च झूठ बोलता है। चर्च से तात्पर्य यहां वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च से है जो कि भारत में `कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया´ द्वारा शासित है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विगत माह उड़ीसा के कंधमाल में एक हिन्दू संत की हत्या के बाद भड़की हिंसा में वहां मुख्य कारण मंतातरण है, यह समस्या एक विकराल रुप लेती जा रही है, जिसमें केन्द्र की सरकार से लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें तक अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही है। उड़ीसा को मुद्दा बना कर `आस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देश भारत पर दबाव बना रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ चर्च बड़ी सफाई से यह झूठ बार -बार बोल रहा है कि `हम धर्मांतरण नहीं करते´ "धर्मांतरण कराने वाले गुप्र या चर्च दूसरे है।" स्पष्ट है कि कैथोलिक चर्च धर्मांतरण के आरोप को खारिज करता है। पिछले दिनों कई टी.वी.चैनलों और आंग्रेजी अखबारों को कैथोलिक चर्च के कई अधिकारियों, बिशपों एवं प्रवक्ताओं ने यहीं कहा कि `हम तो निर्दोष हैं´-हम धर्मातरण करते ही नहीं, वे लोग कोई और हैं।

कैथोलिक चर्च के अधिकारियों का यह तर्क `चर्च की गतिविधियों की मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नही उतर सकता´ क्योंकि एक ओर तो `वैटिकन/ पोप´ विश्व के कोने-कोने में जाकर समस्त पृथ्वी पर `ईसाइयत´ के विस्तार पर जोर दे रहे हैं। खुद `पोप जॉन पॉल द्वितीय´ ने एक दशक पूर्व अपने भारत प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी दक्षिण एशिया में चर्च की होगी। लेकिन आज उनके तमाम अनुयायी `बिशप, फादर, नन्स जोर देकर कह रहे है है कि किसी को ईसाई बनाने या उसका मत-परिवर्तन करने से हमारा कोई लेना देना नहीं है -`हिन्दुत्वादी कट्टरपंथी हमें बक्शें और जो अन्य ईसाई मिशनरी यह कार्य कर रहे हैं उनसे ही निपटें´।

इनके झूठ से पर्दा उठाता है पोप का 10 नवम्बर 1994 को एशिया के बिशपों के नाम लिखा गया एक पत्र जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एशिया के इस भाग में (भारत और चीन) उनके प्राचीन धर्म और संस्कृति के कारण `क्रििष्चयानिटी´ के प्रचार पर दबाव बनता है और टकराव की स्थिति उत्पन होती है। यह ईसाइयत के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हिन्दुइज्म और बुद्धिइज्म को यहां के लोगों ने नशे की सी आदत में अपना रखा है। इस पत्र से पता चलता है कि `पोप और उनके अनुयायियों की मानसिकता कैसी है। उनकी नजर में `हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी मात्र अंधविश्वास के नशे में डूबे हुए लोग है।´जिन्हें कैथोलिक चर्च उस नशे से उबार कर स्वस्थ्य मानसिकता देकर ईसाइयत द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह एक तरह से हिन्दुओं एवं बौद्धों को गाली देने जैसी बात है।

वास्तविकता यह है कि अब हिन्दुओं के सामने भी अपनी संस्कृति और धर्म के आस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति पर सदियों से आक्रान्ताओं ने जुल्म ढाये हैं। कभी उन्हें काफिर कह कर कत्लेआम का ग्रास बनाया गया तो कभी उन्हें मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी कहकर गाली दी गई। यह सिलसिला वर्तमान समय तक चल रहा हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चारों दिशाओं - धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति - पर अलग अलग तरह के मुलम्मे चढ़ाकर सुनियोजित आक्रमण हो रहे है। ऐसी स्थिति में अस्तित्व की रक्षा के लिए साम,दाम,दण्ड-भेद की नीतिया अपनाई ही जायेगी।

नई दिल्ली में जन्तर मंतर पर धरने पर बैठे `कैथोलिक आर्चडायसिस ऑफ दिल्ली के प्रवक्ता ने सफेद झूठ बोलते हुए मीडिया से कहा कि ``वैटिकन ने हमें स्पष्ट आदेश दिया है कि इंच मात्र या इशारे मात्र से भी किसी को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित नहीं करें. उक्त चर्च अधिकारी कितना बड़ा झूठ बोल रहा है यह वैटिकन द्वारा जारी इस आदेश से साफ होता है। `एशिया फार ग्लेसिया´ में पोप/ वैटिकन- बिशपों, फादरों, ननों, कार्डीनल, डीकन और लेइटी को साफ निर्देश देता है कि वह एशिया में कैथोलिक चर्च की गतिविधियों को विस्तार देने में जुट जाए। ताकि एशियावासियों को अधिक से अधिक संख्या में `नया जीवन´ अर्थात मतांतरण द्वारा बचाया जा सकें। स्पश्ट है कि एशिया की जनता बगैर चर्च की शरण में गए मृत्प्राय है जिसे `पोप´ द्वारा नियुक्त किये गए बिशप, कार्डीनल, प्रीस्ट, नन्स व अन्य बप्तिस्मा (क्रििष्चयनटी संस्कार) पाये लोग ही नवजीवन दें सकते है।

दलित पादरी होने का दर्द

लेखक-आर एल फ्रांसिस

भारतीय चर्च अधिकारियों पर धर्मांतरित ईसाइयों के साथ गैर-बराबरी का सलूक करने के आरोप लम्बे समय से लगते रहे है। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों से ईसाई बने करोड़ों लोगों को इस बात की पीड़ा सताती रहती है कि जिन धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक विसंगतियों एवं शोषण के खिलाफ विद्रोह करते हुए उन्होंने चर्च का दामन थामा था, यहां भी उन्हें समानता एवं न्याय नहीं मिल पाया है। चर्च ढांचे पर आज भी उच्चजातीय ईसाइयों का कब्जा है। उन्हीं में से अधिकतर बिशप, पादरी, कार्डीनल, सामाजिक संगठनों के निर्देशक नियुक्त किये जाते है।

दलित ईसाई समुदाय से आए पादरियों की संख्या वैसे ही चर्च ढांचे में नागन्य है। फिर भी अगर किसी आर्च-डायोसिस (धर्म राज्य) में वे एक-दो प्रतिशत भी हो तो भी धर्मांतरित ईसाई समुदाय उनसे बड़ी आशा रखता है। दलित ईसाइयों में आक्रोश एवं निराशा तब बढ़ने लगती है जब उनके बीच से आए पादरियों/ननों के साथ ही आमनवीय व्यवहार शुरु कर दिया जाता है। दरअसल चर्च संसाधनों पर अपना एकाधिकार जमाए बैठे उच्च कलर्जी न तो दलित ईसाइयों और न ही उनके बीच से आए पादरियों/ननों को आगे बढ़ने के समान अवसर देने को तैयार होते हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों एक स्थानीय दलित ईसाई कैथोलिक पादरी `फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´ के परिवार एवं उनके शुभचिंतकों ने नई दिल्ली स्थित कैथोलिक आर्च डायसिस पर उनके प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया व इस सबंध में उनके बड़े भाई श्री लक्ष्मी चंद ने बिषप विन्संट कान्सासियों को एक ज्ञापन दिया जिसमें उनसे क्षेत्रवाद, एवं जातिवाद के अधार पर व्यवहार न करने की अपील की गई है। फादर विल्यम के परिवार ने कैथोलिक बिशप विन्संट कान्सासियों को याद दिलाया है कि उन्होंने विल्यम को पादरी बनाने में अनेक दुख एवं कष्ट उठाये है, उनका परिवार एवं गांव की बहुसंख्यक जनसंख्या हिन्दू है उनके इस निर्णय (अपने भाई को पादरी बनाना) से उन्हें अपने ही परिवार एवं समाज से जो विरोध झेलना पड़ा उसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हरियाणा के मूल निवासी श्री लक्ष्मी चंद का कहना है कि ग्यारह वर्ष के कठिन प्रशिक्षण के बाद जब मेरा भाई प्रेमदास चौधरी से ``फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´´ बनकर चर्च में आया तो हमें इस बात की खुशी थी कि अब `फादर विलियम´ बिना किसी भेदभाव वंचित वर्गों की सेवा करेगा।

`फादर विलियम प्रेमदास चौधरी´ के बड़े भाई श्री लक्ष्मी चंद ने बिशप विन्संट कान्सासियों को दिये अपने ज्ञापन में कहा है कि उन्हें एवं उनके परिवार को यह जानकर गहरा सदमा पहुंचा है कि उन्होंने अपने जिस भाई (फादर विल्यम) को चर्च की सेवा करने के लिए ईष्वर के नाम पर अर्पित कर दिया था उसके साथ चर्च के अंदर ही क्षेत्रवाद एवं जातिवाद के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है। दिल्ली के पीतमपुरा, कोन्डली, मयूर विहार आदि चर्चों के अंदर उनकी नियुक्ति होते हुए भी उन्हें स्वतंत्रता से कार्य करने से रोकने के लिये बिशप विन्संट कान्सासियों एवं उनके सहजातीय पादरियों ने कई रुकावटें खड़ी की। बिशप विन्संट कान्सासियों को दिये ज्ञापन में अरोप लगया गया है कि वह खुद एवं पादरियों का कलर्जी वर्ग स्थानीय दलित ईसाइयों एवं उनके वर्ग के पादरियों के साथ भाषा, क्षेत्रवाद एवं जातिवाद के अधार पर भेदभाव करता है। कैथोलिक आर्चडायसिस महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय दलित वर्गों से आए पादरियों की राय को कोई महत्व नहीं देता, डायसिस उत्तर एवं दक्षिण भारतीय पादरियों के लिए अलग नीति का पालन करता है जो कि चर्च सिंद्वातों एवं ईसाइयत के विरुद्ध है।

`फादर विलियम´ के परिवार का कहना है कि उनका मकसद बिशप या अन्य का अनादर करना नहीं है उन्हें यह कदम इसलिए उठाना पड़ा कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्य को दूसरो के दुख एवं तकलीफों को कम करने के लिए ``ईसा मसीह´´ के नाम पर भेंट कर दिया था लेकिन यहां तो वह खुद दोयम दर्जे का अपमानित जीवन जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है। प्रन्द्रह वर्षो से ज्यादा की निस्वार्थ चर्च की सेवा करने के बावजूद एक स्थानीय दलित ईसाई होने के कारण `फादर विल्यम´ के साथ यह अन्याय एवं भेदभाव हमें सहन नहीं है, चर्च अधिकारी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाए। खुद `फादर विल्यम´ का कहना है कि आर्च बिशप ने उसे चर्च देने से पहले रिट्रीट (एक तरह से पापों की क्षमा) की शर्त लगा दी. हालांकि चर्च कानून के मुताबिक प्रत्येक पादरी को चार वर्ष में एक बार इसके लिये जाना होता है लेकिन उज्चजातिय पादरियों के न जाने के बाद भी उन्हें ऊचें पदों से नवाजा गया है।

दरअसल भारतीय चर्च पर आज भी दक्षिण भारतीय विषेशकर पुर्तगाली लोगों के वंशजों का ही एकाधिकार बना हुआ है यह तथ्य अलग है कि पुर्तगाली यहां की राजनीति में हावी नहीं हो सके, लेकिन उनके वंशज कैथोलिक चर्च पर हावी है, क्योंकि वास्कोडिगामा यहां पोप के द्वारा भेजा गया पात्र था। पुर्तगाली मिशनरियों ने यहां पर पहले से बसे सीरीयन और पुरातन ईसाइयों को जोर-जबरिया अपना दास बना लिया। भले ही भारत पर अंग्रेजों का राज हो गया था किन्तु कैथोलिक चर्च की सत्ता पुर्तगालियों के पास ही थी। केरल और तमिलनाडु के उच्चजातीय ईसाइयों ने इनके साथ मिलकर कार्य करने में ही अपनी भलाई समझी, अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के बाद भी पोप की कूटनीति से कैथोलिक चर्च पर कोई फर्क नहीं पड़ा। `धार्मिक स्चतंत्रता के मूलाधिकार´ ने इन्हें और अधिक शक्ति प्रदान कर दी। जिसके कारण ये और स्वच्छंदता से इठलाने लगे। इनका अंहकार ऊचाइयां छूने लगा। विदेशी मिशनरियों की कृपा से छोड़ी गई अकूत चल और अचल संपति पर अपना एकाधिकार बनाये रखने के लिये चर्च अधिकारियों ने अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिये भारत के वंचित वर्गों के बीच धर्मांतरण का खेल खेलना शुरू कर दिया। अपना संख्या बल बढ़ाते जाने के कारण जहां उन्हें विदेशों से अपार धन मिलने लगा वहीं बढ़ते वोट बैंक के कारण इन्हें भारतीय राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त हो गया। कैथोलिक चर्च के चौदह हजार पादरियों में इस समय एक हजार से भी कम दलित पादरी है एक सौ साठ बिशपों में से केवल आधा दर्जन ही दलित है। आश्चर्यजनक यह है कि कैथोलिकों की कुल जनसंख्या का सत्तर प्रतिशत धर्मांतरित ईसाई है लेकिन मुठ्ठीभर लोग चर्च के अकूत संसाधनों का दोहन अपने निजी स्वार्थों के लिये कर रहे है। अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने के नाम पर चर्च अधिकारी भारतीय समाज के अंदर विभिन्न समुदायों में लगातार तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों को चला रहे है।

हाल ही में उड़ीसा के कंधमाल जिले में फैली व्यापक हिंसा के कारण दर्जनों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जान माल की भारी क्षाति उठानी पड़ी। वहां अनुसूचित जातियों से धर्मांतरित हुये लाखों `पाण´ जाति के लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलवाने की चर्च अधिकारियों का हठ एक बढ़े तनाव का कारण बन गया। दरअसल अनुसूचित जातियों से ईसाइयत में धर्मांतरित होने वाले लोग अपना अनुसूचित जाति का दर्जा खो देते है। इस कारण चर्च अधिकारियों को अपने धर्मांतरण के कार्यक्रम चलाने में भी कठनाई आती है इस कठनाई को जड़ से समाप्त करने के लिये चर्च अधिकारी पिछले कई दषकों से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की सूची में ‘ाामिल करवाने को लेकर तथाकथित आदोंलन चला रहा है। उसकी इस सोच का परिणाम दलित ईसाइयों का विकास नही बल्कि अपने लिये नई जमीन की तलाष करना है। पिष्चमी देषों के संसाधनों से युक्त चर्च नेतृत्व की नजर देष के 16 करोड़ दलित हिन्दूओं पर है। चर्च नेतृत्व एक ही तीर से दो षिकार करने की नीति पर चल रहा है कि उसे मौजूदा धर्मातंरित गरीब ईसाइयों को अपने ढाचें में हिस्सेदारी भी न देनी पड़ी और धर्मांतरण की उसकी दुकान भी चलती रहे।

भारतीय कैथोलिक चर्च पर वेटिकन के दिशा-निर्देश लागू होते है। वेटिकन ही बिशपों की नियुक्तियां करता है। कैथोलिक बिशप स्थानीय समुदाय को कम महत्व देते है उनके कार्यां में हस्तक्षेप करने वाले पादरियों का उत्पीड़न होना आम बात है। वर्ष 2000 में जेस्यूट पादरी अन्थोनी फर्नांडीज का उत्पीड़न इसलिए किया गया जब उन्होंने धर्म-परिवर्तन जैसा कार्य करने से इन्कार करते हुये बिषपों के असीमित अधिकारों को चौनती दी। झांसी आर्चडायसिस के पादरी हैनरी को स्थानीय गरीब ईसाइयों की वकालत करने के कारण उत्पीड़त होना पड़ा। आज भी देष में सैकड़ों पादरी दलित होने के कारण एवं अपने समुदाय की आवाज उठाने का दंड हाषिए पर खड़े होकर भुगत रहे है। करोड़ो दलित ईसाइयों के संगठन `पुअर क्रििष्चयन लिबरेशन मूवमेंट´ ने चर्च अधिकारियों से मांग की है कि वह दलित ईसाइयों और उनके वर्गों से आये पादरियों/ननों के साथ समान्ता का व्यवहार करे। प्रभु ईसा मसीह के सदेंश के अनुसार वह नमक की तरह रहें अगर नमक बेसुवाद हो गया तो फिर वह किसी काम का नहीं रहेगा, सिवाय इसके कि वह बाहर घूरे पर फेंका जाये और लोगों के पैरों तले रौंदा जायें।

नोट- लेखक का कथ्य ज्यों का त्यों है.

शनिवार, 22 नवंबर 2008

अल्पसंख्यक अधिकार आयोग का सवाल

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रणेता के एन गोविंदाचार्य आज पहुंचे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(सुधारकर पढ़ें- अल्पसंख्यक अधिकार आयोग, खासकर मुसलमान-ईसाई अधिकार आयोग). गोविंदाचार्य की शिकायत थी कि आयोग साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की चीख पुकार नहीं सुन रहा है और वो सुनाने आए हैं. उनका कहना था कि साध्वी की आवाज शायद आयोग के कानों तक नहीं पहुंच रही है, इसलिए वे उसकी आवाज को आयोग को सुनाने के लिए पहुंचे हैं. क्या गोविंदाचार्य जी, आप भी सठिया गए हैं. अरे देश में मानवाधिकार आयोग जैसी चीज होती तो देश की ये दुर्दशा होती. गलती से भी महिला आयोग का दरवाजा मत खटखटा दीजिएगा, वर्ना ये लोग आपको महिला विरोधी करार देने से भी नहीं हिचकेंगे.
काहे टेंशन ले रहे हैं साहब, चुनाव करीब है. कांग्रेस को आतंकवाद का कलंक धोने के लिए, हजारों मासूमों के कत्ल का खून साफ करने के लिए डिटरजेंट तो चाहिए. थोड़ा खुद को पाक साफ साबित कर लेने दीजिए. कल तक आप हिंदुवादी लोग राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात करते थे, आज कांग्रेस ने आप राष्ट्रवादियों को आतंकवादी साबित कर दिया न.
पिछले पांच सालों में देश में कम से पचास धमाके हुए हैं, क्या एटीएस कभी इतना हाथ पांव मारी थी. आज क्यों मार रही है. क्यों झूठ पर झूठ बोले जा रही है. क्यों बयान बदल रही है, क्यों रोज-रोज प्रेस कांफ्रेंस कर रही है. दावा कर रही है कि उसके पास सारे सबूत हैं तो आरोपियों पर मकोका क्यों लगा रही है, क्यों नहीं सीधे कोर्ट के सामने सारे सबूत रख रही है. आखिर एटीएस इतना स्यानी कब से हो गई है.
आप भी. क्यों चले गए अल्पसंख्यक अधिकार आयोग के पास. किसी मुसलमान और ईसाई(सिख भी नहीं) को खरोंच भी लगती तो आयोग आसमान सर पर उठा लेता, लेकिन आज आपको उसे साध्वी की आवाज सुनानी पड़ रही है.
छोड़ दीजिए, साहब तरस खाइये, वह जिसका पैसा खा रहा है. उसका गा रहा है. मीडिया पर भी मेहरबानी करिए. वो ईसाई मिशनरियों का पैसा खा-खाकर अल्पसंख्यक गान गा रही है. अच्छा होगा कि आप और हम सभी इस अभियान में शामिल हो जाए.
अल्पसंख्यक अधिकार बाबा की जय
अल्पसंख्यक अधिकार बाबा अमर रहे
कांग्रेस-कम्युनिष्टों की दुकान चलती रहे.
फिर अल्पसंख्यक बाबा की जय

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

फिर से लिखा जाएगा इतिहास?

अगर हालिया उत्खननों से प्राप्त तथ्यों और आदिम जनजाति के जीन के अध्ययनों से प्राप्त रिपोर्ट की माने तो इतिहास को दोबारा लिखने का वक्त आ गया है. प्राप्त तथ्य दर्शाते हैं कि आदिम मानव भारत से यूरोपीय देश गए हैं न कि यूरोप से भारत आए हैं. अध्ययनों से साफ साफ संकेत मिलते हैं कि सबसे पहला इंसान आज से 80,000 वर्ष पहले आंध्रप्रदेश के दक्षिणी भाग में रहा होगा. हैदराबाद स्थित कोशिकीय और आण्विकीय जीवविज्ञान केंद्र यानी सीसीएमबी और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के अध्ययनों से ये तथ्य सामने आए हैं.
इतिहासकार अब तक मानते रहे हैं प्राचीन मानव अफ्रीका से इजराइल, मध्यपूर्व, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के रास्ते भारत आए हैं. लेकिन अंडमान-निकोबार के ओंजी जनजाति के जीन के अध्ययनों से जाहिर हुआ है कि ओंजी जनजाति दुनियां की सबसे प्राचीन जनजाति है. वहीं आंध्रप्रदेश के कूरनूल जिले में हुए उत्खनन भी साबित करते हैं कि यहां करीब 80000 साल पहले इंसानी आबादी बसती थी.
ये अध्ययन इतिहासकारों की उस मान्यता के विपरीत है जिसमें ये कहा गया है कि आर्य यूरोपीय देशों से भारत आए हैं. नये अध्ययन साबित करते हैं आर्य भारत से यूरोप गए हैं.