भारतीय क्रिकेट की एक और बड़ी जीत
भारतीय क्रिकेट की इसे अब तक की सबसे बड़ी जीत कही जा सकती है. इस जीत में मैदान पर मौजूद बारह खिलाड़ी तो शामिल थे ही, उनके साथ मैदान के बाहर बीसीसीआई और देश के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी भी शामिल थे. इस जीत के लिए देश के लाखों ने दुआएं मांगी थी. मामला था- आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एंड्रू साइमंड्स के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी करने का. पूरी आस्ट्रेलियाई टीम ने हरभजन सिंह पर नस्लभेदी टिप्पणी करने का आरोप लगाया. इस आरोप में सच्चाई ज्यादा एक प्रबल प्रतिरोधी टीम को नीचा दिखाने की भावना ज्यादा झलकती है. साइमंड्स ने तो यहां तक कह दिया था- अगर कोई अपनी टीम का खिलाड़ी ऐसी टिप्पणी कर दे तो वे उसे माफ कर सकते हैं, लेकिन एक विरोधी टीम का खिलाड़ी ऐसी टिप्पणी कर दे तो वे उसे कतई बर्दास्त नहीं कर सकते. साइमंड्स की इस टिप्पणी में एक ऐसी मानसिकता झलकती है जो साथी खिलाड़ी को प्रतियोगी से ज्यादा अपना दुश्मन मानती है. दरअसल गाली गाली होती है, चाहे कोई अपना दे या पराया. लेकिन साइमंड्स को गाली से ज्यादा अपने-पराये का फर्क दिखता है. ऐसी स्थिति में हम खिलाड़ी नहीं एक-दूसरे को अपना दुश्मन समझने लगते हैं. इससे खेल की भावना तो आहत होती ही है, साथ ही भद्रजनों का यह खेल अपनी गरिमा को विकेट से गिल्लियों की तरह बिखरते पाता है. जहां तक नस्लभेदी टिप्पणी की बात है, बीबीसीआई ने साफ कर दिया कि भारतीय खिलाड़ी इस तरह की टिप्पणी कर ही नहीं सकता, क्योंकि भारतीय सदियों से नस्लभेदी के खिलाफ लड़ते आया है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश से लेकर विदेशों तक में ये लड़ाई लड़ी थी. आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी भारतीय खिलाड़ियों पर इस तरह का आरोप लगाकर इन्हें बदनाम करना चाहते हैं वो भी उस टीम के खिलाड़ियों को जो बार उनके लगातार विजय के अभियान में बाधा बनता आया है. खैर बात, भारत की जीत के साथ खत्म हो गई. आईसीसी के कमीश्नर ने हरभजन को इस आरोप से बरी कर दिया, हालांकि हरभजन ने साइमंड्स को गाली देने की बात मान ली, जिसकी वजह से उन्हें एडीलेड टेस्ट का आधा फीस जुर्माना के रूप में चुकाना पड़ा. हालांकि आस्ट्रेलियाई भारत की इस जीत को नहीं पचा पा रहा है. हरभजन के बड़ी होने के बाद आस्ट्रेलियाई मीडिया में, क्रिकेटर ऑफ दी शेम जैसी टिप्पणी की गई. वैसे इस बात को छोड़ दें, क्योंकि अपनी भड़ास निकालने का हक सबको है, तो भारत की जीत क्रिकेट जगत की जीत है. लेकिन अब ये सवाल खड़ा होता जा रहा है कि भद्रजनों के इस खेल को क्या हो गया है. जिस क्रिकेट खिलाड़ी को मैदान में जौहर दिखाना चाहिए, वो अदालत के सामने सफाई पेश कर रहा है. एक तरह से देखें तो यह खेल अब खेल से ज्यादा पैसों और राजनीति का दांव पेंच बनता जा रहा है. जिस तरह से इंपायर खिलाड़ियों और टीमों के प्रति भेद-भावपूर्ण फैसले देती है, उससे खेल की गरिमा गिरती है. समय रहते आईसीसी को सचेत होना होगा.
बुधवार, 30 जनवरी 2008
सोमवार, 28 जनवरी 2008
बर्ड-फ्लू का कहर
बर्ड-फ्लू का कहर
पश्चिम में बर्ड-फ्लू कहर बनकर टूटा है. एक के बाद एक करके उन्नीस में से तेरह जिले इसकी चपेट में आ गए हैं. अब तक लाखों पक्षियों को मारा जा चुका है और लाखों को मारने की तैयारी चल रही है. इससे पहले भी महाराष्ट्र और मणिपुर में बर्ड-फ्लू फैला था. लेकिन इस बात मामला ज्यादा गंभीर है. इसकी गंभीरता को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही चेतावनी दे रखी है. इसके बावजूद इससे निपटने में लापरवाही बरतने का आरोप लग रहा है. बीरभूम जिले के लोगों का कहना है कि सरकार इस बीमारी के बारे में उन्हें सही जानकारी मुहैया नहीं करा रही है, इसलिए वे मरे हुए पक्षियों को नदी-तलाबों में फेंक रहे हैं. वहीं कुछ लोग मुआवजे को लेकर अब पक्षियों को मारने के लिए अधिकारियों को सौंपने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं. सरकार अब तक यही कह रही है कि अब तक किसी मानव में इसके संक्रमण के मामले सामने नहीं आए हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि अगर ऐसे मामले सामने आते हैं तो उसके पास भारी मात्रा में दवाएं है, जिससे वह किसी भी स्थिति से आसानी से निपट लेगा. ऐसा नहीं कि सरकार स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रही है और इससे निपटने की कोशिश नहीं कर रही. इतना सब कुछ होने के बावजूद राज्य के उन्नीस में से तेरह जिले इसकी चपेट में आ गए है. बात साफ है कि प्रयास जिस स्तर पर होना चाहिए उस स्तर पर नहीं हो रहा है.
खबरें ऐसी भी मिल रही है, मुर्गियों को मारने के लिए ऐसे लोगों को भेजा जा रहा है जो इस कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य हैं. ये कोई राजनीतिक मामला नहीं है, ये संक्रामक बीमारी है जो फैलती है और तेजी से फैलती है. साथ ही, आम के साथ साथ खास लोगों को भी प्रभावित कर सकती है.
पश्चिम में बर्ड-फ्लू कहर बनकर टूटा है. एक के बाद एक करके उन्नीस में से तेरह जिले इसकी चपेट में आ गए हैं. अब तक लाखों पक्षियों को मारा जा चुका है और लाखों को मारने की तैयारी चल रही है. इससे पहले भी महाराष्ट्र और मणिपुर में बर्ड-फ्लू फैला था. लेकिन इस बात मामला ज्यादा गंभीर है. इसकी गंभीरता को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही चेतावनी दे रखी है. इसके बावजूद इससे निपटने में लापरवाही बरतने का आरोप लग रहा है. बीरभूम जिले के लोगों का कहना है कि सरकार इस बीमारी के बारे में उन्हें सही जानकारी मुहैया नहीं करा रही है, इसलिए वे मरे हुए पक्षियों को नदी-तलाबों में फेंक रहे हैं. वहीं कुछ लोग मुआवजे को लेकर अब पक्षियों को मारने के लिए अधिकारियों को सौंपने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं. सरकार अब तक यही कह रही है कि अब तक किसी मानव में इसके संक्रमण के मामले सामने नहीं आए हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि अगर ऐसे मामले सामने आते हैं तो उसके पास भारी मात्रा में दवाएं है, जिससे वह किसी भी स्थिति से आसानी से निपट लेगा. ऐसा नहीं कि सरकार स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रही है और इससे निपटने की कोशिश नहीं कर रही. इतना सब कुछ होने के बावजूद राज्य के उन्नीस में से तेरह जिले इसकी चपेट में आ गए है. बात साफ है कि प्रयास जिस स्तर पर होना चाहिए उस स्तर पर नहीं हो रहा है.
खबरें ऐसी भी मिल रही है, मुर्गियों को मारने के लिए ऐसे लोगों को भेजा जा रहा है जो इस कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य हैं. ये कोई राजनीतिक मामला नहीं है, ये संक्रामक बीमारी है जो फैलती है और तेजी से फैलती है. साथ ही, आम के साथ साथ खास लोगों को भी प्रभावित कर सकती है.
सोमवार, 21 जनवरी 2008
देश में खाद्यान्न की कमी
अभी-अभी देश के कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि यदि देश के वैज्ञानिक कृषि उत्पादन बढाने के लिए जल्द ही कोई उपाय नहीं करते हैं तो देश में खाद्यान्नों की भारी कमी हो, सकती है। जिस देश की अर्थ-व्यवस्था हर साल करीब दस प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही हो, उस देश में खाद्यान्न की कमी हो जाय, इससे ज्यादा शर्म वाली बात और क्या होगी? दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था का ढिंढोरा पिटते थकते नहीं हैं हम, उस देश में खाद्यान्न की कमी हो जाये, और हमें होश नहीं हो कि हम क्या कर रहें हैं? कितनी ताज्जुब की बात है। वैज्ञानिकों से आह्वान करके हम अपने कर्तव्यों से छुटकारा तो पा सकते हैं। लेकिन ज्यादा अनाज नही उपजा सकते हैं। शरद पवार के गृह-राज्य की ही बात करें तो वहाँ केवल एक विदर्भ क्षेत्र में हज़ारों किसानों को आत्मा हत्या करने को मजबूर होना पड़ा। वहाँ के मुख्यमंत्री किसानों की दुर्दशा पर अट्टहास करते हैं। किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर करने पर मजबूर कर रही है तो वो है सरकार। चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, सभी इसमे शामिल हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ नहीं सकते। आज़ाद भारत में कृषि के विकास के लिए गाँव-गाँव में राजकीय ट्यूब-वेल लगाए गए थे, क्या सरकार को मालूम है कि उनमें कितने ट्यूब-वेल चालू हालत में हैं? सरकार पूंजीपति-उद्योगपतियों के लिए कुछ ही दिनों में हजारों सेज मंजूरी दे सकती है, लेकिन आत्महत्या कर रहे किसानों पर तरस भी नही खा सकती है। सरकार ने राष्ट्रिय किसान आयोग का गठन किया। आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी, लेकिन सरकार उन सिफारिशों को लागू नहीं करती। भारत में हरित क्रांति के अग्रदूत रहे एस स्वामीनाथन और शोधकर्ता पी साइनाथ जैसे लोगों को सरकार तरजीह तक नहीं देती। सरकार जब विदेश से सब कुछ माँगा ही सकती है तो किसानों की सुध लेने की क्या जरूरत है।
रविवार, 20 जनवरी 2008
विकिपीडिया में पांच निर्वाचित लेख
हिन्दी विकिपीडिया में लेखों की संख्या के साथ-साथ निर्वाचित लेखों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस समय निर्वाचित लेखों की संख्या पांच हो गयी है। रामायण, महादेवी वर्मा, सत्यजीत राय, भारत और राखी पर लिखे गए लेखों को उत्कृष्ट मानकर इन्हें निर्वाचित किया गया है। और भी कई लेख हैं जिन्हें अच्छा तो कहा जा सकता है, पर उत्कृष्ट नहीं। आप इन्हें उत्कृष्ट बना सकते है या किसी विषय पर आप नया और उत्कृष्ट लेख लिख सकते हैं। बदले में आपको मिलेगा तो कुछ नहीं, लेकिन आप अपनी हिन्दी भाषा के विकास में महान योगदान कर रहे होंगे।
शुक्रवार, 18 जनवरी 2008
बीबीसी से अंग्रेजी सीखिए
समाचारों की दुनिया में बीबीसी का नाम शायद ही किसी के लिए अनजाना हो। लेकिन बीबीसी अंग्रेजी भाषा सीखने वालों के लिए भी संसाधन मुहैया करता है। बीबीसी हिन्दी .कॉम अंग्रेजी सीखने को इच्छुक लोगों के लिए अंग्लो-हिन्दी माध्यम में बेहतर सामग्री देता है, वो भी बिल्कुल मुफ्त तो अपने अंग्रेजी ज्ञान को बेहतर करने के लिए बीबीसी हिन्दी.कॉम पर लाग़ ओन् करें.
शुक्रवार, 11 जनवरी 2008
अमेरिकी साम्राज्य के रक्तबीज
iraak MEIN 2003 MEIN HUE AKRAMAN KE BAD SE VHAN 1,51,000 LOG MARE GAE । YE AANKDE SANYUKTA RASHTRA KE SARVEKSHAN KE E REPORT SE SAMNE AAYE HAIN। IS SARVEKSHAN KE DAURAN EK SARVEKSHANKARTA KEE HATYA KAR DEE GAYEE, JABKI KUCH KARMACHARIYON KAA APHARAN KAR LIYA GAYA THA। IS SARVEKSHAN SE ITAR AANKDON PAR GAUR KAREN TO KUCH AJENSIYON KEE REPORT MEN MARNE VALON KEE SANKHYA CHHAH LAKH KE KAREEB BATAYA GAYA। VIBHINNA ANUMANON AUR ADHYAYANON PAR ADHARIT AANKADON KE E BAAT CHHOD BHI DEN TO 2003 KE BAAD SE AB TAK SHAYAD HEE KOI AISA DIN GUJRA HO, JIS DIN DESH KE KISI NA KISI SHHAR MEN HAMLE NAHIN HUE HON AUR USMEN LOGON KEE JAAN NAHEEN GAYE HON।
AMERICA KE RASHTRAPATI GEORGE BUSH NE APNEE JID AUR HATHH PAR LAKHON LOGON KO MAUT KE MUNH MEIN JHONK DIA। JIS JANSANHAR KE HATHIYAR KE NAAM PAR IRAQ PAR HAMLA KIYA GAYA। VO CHEMICAL, BAAYOLOJICAL AUR PARMANOO HATHIYAR KAA EK TUKDA BHI IRAQ KE PAAS NAHI THA। IRAQ KE RASHTRAPATI SADDAM HUSAIN KO JHUTHE MUKADME MEN PHANSAKAR BADE HEE GAIR-KANOONI DHANG SE PHANSI KE FANDE SE LATKA DIYA GAYA।
DESH MEN LOKTANTRA KEE STHAPNA AUR SHANTI BAHALEE KE NAAM PAR DESH KO GRIH YUDDHA AUR JATIYA SANGHARSHA KE ANTHEEN DALDAL MEIN DHAKEL DIYA GAYA। AAJ IRAQ JIS ASTHIRTA KEE DAUD SE GUJAR RAHAA HAI, ISKE LIYE KAUN JIMMEDAAR HAI? MANVATA KE KHILAF APRADH LE LIYE BUSH AUR USKE PRASHASAN KO NYAY KE KATHAGHARE MEIN KYON NAHIN KHADA KIYA JATA?
EK SAMAY THA JAB ROOS AFGHANISTAN MEN ROOS KO HARANE KE LIYE AMERICA NE AATANKVADIYON KO SAHARA DIYA। AFGHANISTAN SE ROOS KO HATNA TO PADA, LEKIN UNHIN AATANKVADIYON NE AMERICI SAMRAJYAVAD KE PRATEEK VARLD TRADE CENTRE KO JAMINDOJ KAR DIYA। BHARAT DASHAKON SE PAK-PRAYOJIT AATANKVAD KEE MAAR JHEL RAHAA hai। अब इन्हीं आतंकवादियों ने पाकिस्तान को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान को अमेरिका ने हमेशा इस्तेमाल किया है। पाकिस्तान के शासक खुद सत्ता पर काबिज रहने के लिए कट्टरपंथियों का साथ दिया, आज कट्टरपंथी उसी के लिए भस्मासुर बन चुके हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद के रक्तबीज आज दुनिया के लिया खतरा बने हुए हैं।
AMERICA KE RASHTRAPATI GEORGE BUSH NE APNEE JID AUR HATHH PAR LAKHON LOGON KO MAUT KE MUNH MEIN JHONK DIA। JIS JANSANHAR KE HATHIYAR KE NAAM PAR IRAQ PAR HAMLA KIYA GAYA। VO CHEMICAL, BAAYOLOJICAL AUR PARMANOO HATHIYAR KAA EK TUKDA BHI IRAQ KE PAAS NAHI THA। IRAQ KE RASHTRAPATI SADDAM HUSAIN KO JHUTHE MUKADME MEN PHANSAKAR BADE HEE GAIR-KANOONI DHANG SE PHANSI KE FANDE SE LATKA DIYA GAYA।
DESH MEN LOKTANTRA KEE STHAPNA AUR SHANTI BAHALEE KE NAAM PAR DESH KO GRIH YUDDHA AUR JATIYA SANGHARSHA KE ANTHEEN DALDAL MEIN DHAKEL DIYA GAYA। AAJ IRAQ JIS ASTHIRTA KEE DAUD SE GUJAR RAHAA HAI, ISKE LIYE KAUN JIMMEDAAR HAI? MANVATA KE KHILAF APRADH LE LIYE BUSH AUR USKE PRASHASAN KO NYAY KE KATHAGHARE MEIN KYON NAHIN KHADA KIYA JATA?
EK SAMAY THA JAB ROOS AFGHANISTAN MEN ROOS KO HARANE KE LIYE AMERICA NE AATANKVADIYON KO SAHARA DIYA। AFGHANISTAN SE ROOS KO HATNA TO PADA, LEKIN UNHIN AATANKVADIYON NE AMERICI SAMRAJYAVAD KE PRATEEK VARLD TRADE CENTRE KO JAMINDOJ KAR DIYA। BHARAT DASHAKON SE PAK-PRAYOJIT AATANKVAD KEE MAAR JHEL RAHAA hai। अब इन्हीं आतंकवादियों ने पाकिस्तान को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान को अमेरिका ने हमेशा इस्तेमाल किया है। पाकिस्तान के शासक खुद सत्ता पर काबिज रहने के लिए कट्टरपंथियों का साथ दिया, आज कट्टरपंथी उसी के लिए भस्मासुर बन चुके हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद के रक्तबीज आज दुनिया के लिया खतरा बने हुए हैं।
बुधवार, 2 जनवरी 2008
हमले पर बयान
नए साल के मौक़े पर आतंकवादियों ने उत्तरप्रदेश के रामपुर में सी आर पी एफ पर हमला कर सात जवानों सहित आठ लोगों की हत्या कर दी। वहीं नक्सली उग्रवादियों ने बिहार के मुंगेर और झारखण्ड में दो हमलों को अंजाम दिया। हर बार की तरह इस बार भी आतंकवादी हमले पर गृह मंत्रालय की ओर से बयान जारी हुआ। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा-खुफिया जानकारी तो बार-बार राज्यों को दी जा रही है कि आतंकवादी हमला कहीं भी और कभी-भी हो सकता है। कितने दुःख कि बात है कि हमारा गृह मंत्रालय कह रह है कि आतंकवादी हमला कहीं-भी और कभी-भी हो सकता है। जब ये बात कहनी है तो ये कोई भी कह सकता है। फिर हमें ये सब कहने के लिए गृह मंत्रालय कि क्या जरुरत है। कुछ महीने पहले सी आर पी ऍफ़ के एक कार्यक्रम में गृह मंत्री ने इसी तरह का अप्रत्याशित बयान दिया था कि निकट भविष्य में आतंकवाद और नक्सल समस्या को आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है। जब गृह मंत्रालय इस सच्चाई का बयान करने लगे तो आम जनता का क्या होगा? ये बयान उस देश के गृह मंत्री का है-- जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और संप्रभु राज्य है और जिसकी सेना दुनिया के नक्शे पर बंगलादेश जैसे स्वतंत्र राज्य का मानचित्र खींच सकती है.
मंगलवार, 1 जनवरी 2008
समस्या की जड़
udiisaa के कंधमाल में पिछले दिनों जातीय हिंसा का खौफनाक चेहरा देखने को मिला। कंधमाल जिले के ब्रह्मनिपुर गाँव में चर्च पर विवाद को लेकर जातीय हिंसा भड़क उठी थी। वयोवृद्ध संत और वीएचपी नेता स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती घटनास्थल पर जा रहे थे। तभी तीन सौ लोंगों की एक भीड़ ने उनपर जानलेवा हमला कर दिया था। इसके बाद जो कुछ हुआ--जगजाहिर है। ईसाईयों के गिरिजाघर फूंके गए, घरों को जलाया गया। जिनका घर जलाया गया, वे पहले गरीब थे। आज भी गरीब है। फर्क सिर्फ इतना आया कि इनमें से कई पहले हिन्दू थे, अब ईसाई बन गए हैं। गरीब आदिवासी इलाक़ों के गरीबों को नाना प्रकार के प्रलोभनों के जरिये, उन्हें धर्मान्तरित किया जाता है। उनका धरम तो बदल जाता है, लेकिन उनकी गरीबी ज्यों की त्यों बनी रहती है। धर्मपरिवर्तन के बाद भी वे अनुसूचित जनजाति का हक चाहते हैं, जो इस तबके के लोंगो को चुभता है। और वे इन परिवर्तित लोगो को अपने जैसे दर्जा बरकरार रखे जाने का विरोध करते हैं। दोनो के बीच हक का संघर्ष शुरू हो जाता है।
अगर धर्मं बदलने के बाद भी गरीबी बरकरार रहती है, तो मिश्नारियां बेहतर जीवन का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन क्यों कराती हैं?
सरकार जाती -धर्म से ऊपर उठाकर गरीबों को गरीब क्यों नही मानती? और इनकी समस्याओं को क्यों नही सुलझती ताकि गरीबों को बेहतर जीवन के लालच में धरम नहीं बदलना पड़े?
अगर धर्मं बदलने के बाद भी गरीबी बरकरार रहती है, तो मिश्नारियां बेहतर जीवन का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन क्यों कराती हैं?
सरकार जाती -धर्म से ऊपर उठाकर गरीबों को गरीब क्यों नही मानती? और इनकी समस्याओं को क्यों नही सुलझती ताकि गरीबों को बेहतर जीवन के लालच में धरम नहीं बदलना पड़े?
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