हिंदी शोध संसार

शनिवार, 12 अप्रैल 2008

टूलबार में डिज़लर



पिछलीबार हमने बात की थी बात हिंदी टूलबार की. हिंदी टूलबार में ही एक और विशेष टूल के बारे में बताता हूं. हिंदी टूलबार के मनोरंजन आइकॉन पर क्लिक करें. एक ड्रॉप-डाउन मैन्यू दिखेगा. ड्राप-डाउन मैन्यू में नीचे से डिज़लर शब्द दिखेगा. डिज़लर पर क्लिक करने पर एक विंडो खुलेगा. विंडो में चार आइकन है. म्यूजिक, वीडियो, रेडियो और गेम्स.
यहां आप रेडियो भी सुन सकते हैं. वीडियो भी देख सकते हैं, मनपसंद म्युजिक सुन सकते है और मनपसंद गेम भी खेल सकते है.
आपकी मदद के लिए यहां सर्च इंजन भी है.
माना आप किशोर कुमार का गीत सुनना चाहते हैं. म्युजिक आइकन पर क्लिक करके सर्च इंजन में किशोर टाइप करें और देखिए किशोर के मनपसंद गाने आपके सामने होंगे.
इसी तरह आप वीडियो का भी चयन कर सकते हैं.

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

हिंदी टूलबार



हिंदी टूलबार हिंदीप्रेमी नेटसेवियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है. इस टूलबार को मैंने पहले भी कई बार देखा था. इसकी उपयोगिता नहीं जानता था, इसलिए कभी हाथ नहीं लगाया. क्या मन हुआ दिन-चार रोज पहले इसे अपने लैप-टॉप(चल संगणक) में पर सुचारू कर लिया. सुचारू करने के बाद उपयोग. धीरे-धीरे इसकी खूबियों का पता चलने लगा. जहां तक इसे जान पाया हूं, यह किसी खजाने से कम नहीं है.
इसकी कुछ खूबियों के बारे में बताता हूं.
इसकी खूबियों को विस्तार से बताऊं इससे पहले बता दूं कि यह आपके वेब-ब्राउजर पर सुचारू होता है। आप इंटरनेट एक्सप्लोरर का इस्तेमाल कर रहे हो या मोजिला-फायर फॉक्स, अपने एड्रेस बार पर

http://hindiblog.ourtoolbar.com/

टाइप करें

या, यहां से सीधे डाउनलोड करें






आप डाउनलोड टूलबार पर क्लिक करें. पूछेगा रन या सेव. रन कर लें और आपके ब्राउजर में टूलबार सुचारू हो जाएगा.
अब आइये जानते हैं इसकी खूबियों के बारे में,




  1. पिटारा- यह टूलबार के सबसे बांयी ओर दिखाई देता है. पिटारा हिंदी सर्च-इंजन है. आप किसी विषय पर हिंदी में जानकारी चाहते हैं, पिटारा खोजक टाइप करिए. इंटर करते ही आपकी खोज आपके सामने हाजिर होगी.

  2. टूल-टूलबार का दूसरा औजार है. बहुत उपयोगी है.

  3. पत्रिकाएं- यह तीसरा टूल है. यहां एक जगह मौजूद हैं हिंदी की लगभग तमाम अच्छी पत्रिकाएं. यहां पॉडभारती नाम की श्रव्य पत्रिका भी है और अभिव्यक्ति, वागर्थ जैसी पाठ्य पत्रिकाएं भी.

  4. लिंक- टूलबार का चौथा औजार. यहां हिंदी पोर्टल, सर्च इंजन, शब्दकोश, समाचारपत्र और भी बहुत कुछ आपको मिलेगा.

  5. चिट्ठे- यहां आपको हिंदी ब्लॉग्स मिल जाएंगे.

  6. क्रिकेट- यहां क्रिकेट का लाइव स्कोर देख सकते हैं.

  7. अगला टूल तो सिर्फ चिह्नों में दिखता है, मगर है उपयोगी. यहां आपको मिलेगी आपका मनपसंद रेडियो चैनल. यहां सौ से भी ज्यादा रेडियो चैनल मौजूद है. गाना रफी का सुनना हो या गजल जगजीत सिंह की या बहना हो भक्ति संगीत की धारा में यहां सबकुछ है.
    आगे है आपका इमेल- आपके इमेल बॉक्स में मेल आया है या नहीं, यहीं से आपको पता चल जाएगा इसके लिए अपने एकाउंट में जाने की जरूरत है.

  8. समाचार- यहां है हिंदी के प्रमुख समाचार पत्रों के मुख्य समाचार.
    चिट्ठों पर ताजा- हिंदी चिट्ठों पर अभी क्या छपा है और आपने नहीं पढ़ा है. यहां जान सकते हैं.

  9. मनोरंजन- यहां है कई टीवी चैनल्स. इसके लिए आपके सिस्टम पर टीवी ट्यूनर लगाने की जरूरत नहीं पडेगी. साथ ही, वीडियो क्लीप्स और हिंदी फिल्में भी. साथ ही कर सकते हैं दुनियाभर की सैर मानचित्रों में.

  10. आगे है मौसम का हाल

  11. आगे है पिक्सीज रेडियो, टेलीविजन और अंग्रेजी न्यूज हेडलाइन्स.
    अब तो संदेह नहीं रहा कि यह खजाना है. अब आनंद लीजिए नेट का.

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

ढ़ोल-पीपीहावादी स्वागत

आज सुप्रीमकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में उच्चतर शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी जातियों को सत्ताईस फीसदी आरक्षण देने वाले सरकारी कानून पर मोहर लगा दी है. सभी दलों ने ढ़ोल पीपीहे से साथ इस फैसले का स्वागत किया है. खुद को सबसे अलग कहने वाले पार्टी भाजपा ने भी स्वागत किया है. सच है- सांच कहा जग मारन धावे झूठा जग पतियाने. है न साधो ये देश अंजाने. देश में विरोध हो या प्रशंसा दोनों ही, पीपीहावादी ही होते हैं. कुछ समय पहले तक पीपीहावादी विरोध का दौर था. सबने पीपीहा बजाकर परमाणु करार का विरोध किया था और आज प्रशंसा और स्वागत का दौर है. यहां भी पीपीहा बजाकर लोग स्वागत कर रहे हैं. आखिर हम पुंछधारी बंदर से इंसान बन गए हैं तो एक विशेषता तो आना स्वाभाविक है.

सुप्रीमकोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है. उसेका हरेक फैसला सबको शिरोधार्य होना चाहिए, इसमें किसको कहां गुरेज है. पर पीपीहावादी स्वागत ने तो सबको एक पांत में खड़ा कर दिया. अब जिसके लिए यह सब किया गया, बेचारा वह मतदाता पसोपेश में पड़ जाएगा. सब यही सोचेगा कि यार सबका मुंह तो एक जैसा ही है, किसको वोट डाले किसको नहीं. मिलाजुला कर सबने इसका जुगाड़ कर लिया. अब कांग्रेस को स्वाभाविक परेशानी होगी. सोचेगी, कैबल लगाया मैने और टीवी देखे मेरे पड़ोसी. आखिर उसको ये सब कैसे पचेगा. अब वह जगह जगह रोड शो करेगी- रैली निकालेगी. करोड़ो रुपये पानी की तरह बहाएगी, लोगों को सिर्फ ये बताने के लिए कि भाइयों और बहनों, मेरे उभय मतदाताओं ये जो सामाजिक अन्याय की गुमटी है वो मैंने लगाई है. आप इसे कैसे बर्दास्त करेंगे कि मेरी लगाई गुमटी पर कोई दूसरा आकर पान बेचने लगे.

मेरे उभयचरों, आप तो साफ साफ जानते हैं कि महंगाई के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार कतई नहीं है. इसके लिए राज्यसरकार जिम्मेदार है. जैसा कि नंदीग्राम हिंसा के लिए सीपीएम कतई जिम्मेदार नहीं थी, उसके लिए तो माओवादी नक्सली जिम्मेदार थे.

खैर आप जल में रहे या थल में, आपके लिए तो दोनों ही परिस्थितियां एक जैसी है. आप दोनों ही स्थितियों में खुश रह लेंगे पर मुझे जो सत्ता की परिस्थिति में रहने की आदत पड़ गई है उसके बिन पांच साल तो क्या एक दिन भी अपना गुजारा नहीं होगा.

और इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार कौन हैं- ये पीपीहावादी स्वागताध्यक्ष और थाप देने वाले कार्यकर्ता. अगर ये थोड़ी देर के लिए चुप रह जाते तो इनका क्या बिगड़ जाता. इन्हें कौन सत्ता की परिस्थितियों में जीने की आदत है. लेकिन एकबार चस्का लग चुका है. बेचारे बार-बार चंदन घिसना चाहते हैं.

पीपीहावादियों को डर है कि एक के बाद एक वोट बैंक पर सत्ताधारी पार्टी सेंध लगाए जा रही है. देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, की बात कहकर प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यकों का अनुग्रह हासिल कर लिया. रही-सही कसर आम बजट में अल्पसंख्यकों के लिए अलग धन के आवंटन की बात कहकर पूरी कर ली. किसानों को मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखाकर सत्ता की किलेबंदी कर ली. सामने थे सरकारी कर्मचारी उनके लिए भी पोटली खोल ली. लो अच्छा-खासा कोरिडोर तैयार हो गया. अब आरक्षण पर मोहर लग जाने से भई अपनी तो बल्ले बल्ले हो गई.

इन सबसे के बीच अछूत बने अगड़ी जाति के लोगों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है. यह जाति किसी के चुनावी एजेंडे में नहीं है. इसकी चर्चा कोई नहीं करता. ये किस परिस्थिति में जी रहे हैं इसके लिए कभी कोई सर्वेक्षण नहीं होता. जानने की कोशिश नहीं होती कि आखिर इन्हें भी मदद की जरूरत हो या नहीं. आखिर ऐसा क्यों. वजह साफ है कि ये इतनी नगण्य संख्या और इतना ज्यादा असंगठित है कि यह किसी भी राजनीतिक दल या पार्टी को सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचा सकता. फिर इस पर कोई ध्यान दें तो क्यों दे.

जब अल्पसंख्यक समुदाय से आरक्षण की मांग उठती है तो उस पर सरकार के मंत्रियों को कहना पड़ता है कि उनकी आवाज को ज्यादा दिनों तक नहीं दबाया जा सकता. इसमें क्या दो राय हो सकती है कि एक पुख्ता वोट बैंक की आवाज को ज्यादा दिनों तक नहीं दबाया जा सकता है.

देश का विकास और सामाजिक न्याय जातिवादी और धर्मवादी राजनीति से मिलेगा? तो फिर टुकड़ों में देश को क्यों बांटने की साजिश क्यों?

एक छोटी सी बात समझने में इतनी माथापच्ची क्यों कि दुनिया में महज दो जातियां हैं- एक गरीब की और एक अमीर की. गरीब को गरीब रखने की साजिश इसलिए भी रची गई कि इसकी आंच पर राजनीतिक रोटियां आसानी से सेंकी जा सकती है.

बुधवार, 9 अप्रैल 2008

चर्चा के केंद्र में हिंदी



चर्चा के केंद्र में हिंदी
इसे साहस कह लीजिए या दुस्साहस. हो दोनों में से कोई, मैं करने जा रहा हूं. मैं एक ऐसा प्राणी हूं, जो किसी एक चीज पर कुछ सप्ताहों तक ध्यान केंद्रित नहीं रख सकता है. बात जुलाई-अगस्त महीने की है. मुझे इंटरनेट का चस्का लगा. देर से ही सही, लग गया. पांच छह घंटे रोजाना तो आम बात है. छुट्टी के दिनों में दस बारह घंटे भी खप जाता है.
सोच रहे होंगे, भूमिका ही बनाओगे या कुछ कहोगे भी. अधीर न बनिेए, साहब कहने के लिए ही भूमिका बना रहा हूं. इतना समय जो मैंने इंटरनेटर पर खपाया, उसमें एक ही चीज ढूंढ पाया. वो है हिंदी के लिए चर्चा, हिंदी के लिए लोगों में जबरदस्त बेचैनी.
कल तक सोचा करता था हिंदी के बारे में सिर्फ मैं सोचता हूं. आज लग रहा है, नहीं, हिंदी के बारे में सोचने वालों की कोई कमी नहीं है. यहां सिर्फ सोचने वालों ही नहीं, करने वालों की भी कमी नहीं है. ये सोचने और करने वाले महज कामगार नहीं हैं, बल्कि तकनीक की शक्ति से लैस हैं और अपनी मातृभाषा को सर्वव्यापी और सर्वनिष्ठ बनाने के लिए काम कर रहे हैं.
सरकारी प्रयासों ने हिंदी को जितना जटिल और दुरग्राह्य बनाया है, ये वरदपुत्र इसे उतनी से सरल बनाने के कार्य में जुटे हैं.
इन बरदपुत्रों में सिर्फ हिंदी भाषी लोग ही नहीं, बल्कि गैर-हिंदी-भाषी लोग भी हैं. वैसे दर्जनों उदारहरण हैं कि गैर-हिंदीभाषियों ने हिंदी के पुनर्रुत्थान में महती भूमिका निभायी है.
आंध्रप्रदेश के शिवशंकर नामक व्यक्ति के पास लगातार बहत्तर घंटे तक हिंदी व्यापक पढ़ाने का विश्वरिकॉर्ड है. हिंदी के पहले प्रोफेसर भी आंघ्ररप्रदेश के ही रहनेवाले थे.
विषय से भटकाव के लिए क्षमा चाहूंगा.
नेटपर इन दिनों चर्चा गरम है- हिंदी अनुवाद के संबंध में. रेल-टिकटों पर एक ही जगह का नाम अलग-अलग तरीके से लिखा मिलता है. कई सज्जनों ने इस संबंध में राय रखी थी कि अंग्रेजी से हिंदी में लिप्यांतरण से ये समस्या आती है. उनका सुझाव था कि हिंदी से अंग्रेजी में लिप्यांतरण किया जाए तो इस तरह की समस्या नहीं आएगी. चूंकि हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सका है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यह जैसी लिखी जाती है वैसी ही बोली भी जाती है.
हिंदी में मानकीकरण पर जोर दिया जाना चाहिए. इसके लिए सरकारी एजेंसियां ही बेहतर है, बशर्ते वह इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करे. जहां तक शब्द निर्माण की बात है, केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने बेहतर कार्य किया किया, लेकिन सरकारी स्तर पर जो अनुवाद किए और कराए जा रहे हैं, उससे हिंदी का तो भला कतई नहीं हुआ. अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद दोनों की प्रकृति समझ कर किया जाना चाहिए. हिंदी में सरल और छोटे वाक्य उत्तम माने जाते हैं तो अंग्रजी में जटिल और लंबे वाक्य लिखने की परंपरा है. बेहतर होता कि हिंदी में मौलिक कार्य किए जाएं.
ये निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि सूचना तकनीक और जनसंहार के इस्तेमाल से ही हिंदी का कल्याण हो सकता है. हिंदी खुद को प्रस्तुत करने में कितना सक्षम है, खुद के दम पर रचे चिट्ठा संसार की ऊंचाईयों को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है. आज सिर्फ साहित्य ही नहीं, विज्ञान, तकनीक, व्यवसाय, कानून आदि को विषय बनाकर स्बतंत्र ब्लॉग लिखे जा रहे हैं.
हिँदी के पास आज अपना सर्च-इंजन है, बेहतर टूलबार है, एक से बढ़कर एक पोर्टल आ रहे है, अच्छे-अच्छे समाचार पन्ने हैं.
और तो और हिंदी के पास आज चिट्ठाजगत, हिंदीब्लॉग, अक्षरग्राम है.
समस्याओं के समाधान के लिए एक से बढ़कर एक दिमाग काम कर रहे हैं.
आने वाले समय ये छटपटाहट और बढ़ेगी, समस्याओं के समाधान के लिए और भी कुशल दिमाग काम करेंगे. फिर, दुष्यंत कुमार की तरह कोई क्रांति का राग छेड़ेगा-
मेरे सीने में न सही, तेरे सीने में सही
आग हो लेकिन कही भी आग जलनी चाहिए.
पीड़ा के पर्वत को पिघलाकर गंगा तो पहले ही फूट चुकी है. इस प्रबल प्रवाह को रोकना किसके बस की बात है?

रविवार, 6 अप्रैल 2008

पत्थर

पत्थरों से
प्रतिमाएँ बनाई जा सकती है
कल्पना की ऊँचाई तक
वे खूबसूरत भी सकती हैं।
पत्थर
दे सकता है प्रेरणा
कह सकता है कि
इसे तराश कर
बना सकते हो तुम
देव प्रतिमाएँ।
पत्थर से
बनाई जा सकती हैं मंदिरें
बाँध, पूल, सड़क और इमारतें।
पत्थर जो कई बार जोड़ता दिलों को
लता है करीब इंसानों को
पैदा करता आग
गर कूबत हो तुम में
इसमे रगड़ पैदा करने की।
पर पत्थरों के पास दिल नहीं होता
उनमें प्यार के फूल खिल नहीं सकते
उसे हर प्यासी रूह नचाती है
हर कोई उसका उपभोग करता है
हर कोई वासना की मूर्ति gadta है।
कोई यह सोचकर उसे मत apnaye कि
यह मेरा है
मेरे लिए है
apnata है to उसे क्या मिलेगा
बस और बस पीड़ा
आह, दर्द और vedna।
पत्थर नहीं हो सकता है किसी का
क्योंकि उसके पास नही होता है
एक adad दिल ।
तभी to nachati है उसे
हर किसी की
viksit और aviksit कल्पना.