| पिछले सप्ताह की बात है-- एक बडे राष्ट्रीय चैनल पर-- जो कभी कभार जुबान पर सच और दिल में इंडिया होने की बात बडे गर्व के साथ करता है-- एक कार्यक्रम में एक सवाल पूछा गया था। वो सवाल था-- देश के संसाधनों पर किसका हक है-- सवाल का जवाब इन तीन विकल्पों में चुनना था-- १- अल्पसंख्यकों का २- बहुसंख्यकों का ३- जिसकी लाठी, उसकी भैंस। सवाल को देखने से साफ हो जाता है कि देश के संसाधनों पर सिर्फ अल्पसंख्यकों या सिर्फ बहुसंख्यकों या फिर जो लड़कर जीत सकता है उसी का हक होगा। हमारे देश के एक बडे राष्ट्रीय चैनल की मानसिकता दो खंडो में विभाजित है। इस सवाल का संदर्भ- गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस बयान के परिप्रेक्ष्य में था-- जिसमें मोदी ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में-- ११वे पंचवर्षीय योजना में मुसलमानों को ज्यादा तरजीह देने को-- सांप्रदायिक बजट-- करार दिया था। इस संबध में-- हिंदुस्तान TIMES में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का एक आलेख छपा-- जिसमे येचुरी ने मुसलमानों को ज्यादा तरजीह देने की बात को इस आधार पर सही ठहराया था कि मनमोहन से पहले इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी भी इस तरह की पहल कर चुके थे। देश की आजादी के बाद करीब सालों तक कांग्रेस ने शासन किया। इंदिरा ने गरीबी हटाओ का नारा दिया-- गरीबी नहीं हटी, भले गरीब अपनी जंग हारकर मिट रहे हो। मनमोहन सिंह की सरकार ने मुसलमानों की स्थिति जानने के लिए सच्चर समिति बनाईं- और आज वे आज देश के संसाधनों में मुसलमानों को पहला हक दिए जाने की बात कर रहे है। मनमोहन को इन सवालों के जवाब भी देने चाहिऐ-- आज सच्चर समिति की रिपोर्ट जो हकिक़क बयां कर रही है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या देश पर चालीस साल राज करने वाली पार्टी कांग्रेस इसके लिए जिम्मेदार नही है? क्या मनमोहन सिंह को मालूम है कि इस देश मैं समाज के कई तबकों की स्थिति सच्चर समिति की रिपोर्ट से भी बदतर है? मनमोहन सिंह की सरकार उन मज्लूमों के लिए कुछ क्यों नहीं करती? क्यों नहीं सरकार सम्पूर्ण भारत का सर्वेक्षण कर गरीबो की पहचान करती है? क्यों नही सरकार सभी गरीबों के विकास के लिए एक जैसा कदम उठती है? सच्चर समिति के अनुसार, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की संख्या कम है। इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाना चाहिऐ? इसके लिए मुसलमानों की शिक्षा ज्यादा दोषी है, जो मदरसों से शुरू होकर मदरसों में खत्म होती है। सरकार उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा देने के लिए प्रावधान क्यों बनती। दर-असल इस पूरे कवायद का मकसद मुल्लाओं के फरमान को अपने पक्ष में करना है, ताकि कांग्रेस सत्ता की गद्दी पर युगों-युगों तक कायम रहे- भले ही देश का बंटाधार हो जाये। मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस की दें है और यह कई रूपों देश को बाँट रहा है। |
सोमवार, 31 दिसंबर 2007
समाज को बांटने में तुष्टिकरण का योगदान
शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007
बेनजीर नहीं रही
बेनजीर नहीं रहीं। कोई उन्हें शहीद का दर्जा देना चाहेगा, जैसा की हिंदुस्तान में आमतौर पर होता है। लेकिन बेनजीर आतंकवाद का शिकार हुईं। आतंकवाद, जिसे वहाँ के शासकों ने बढावा दिया। पाल-पोस कर बड़ा किया। आज उन्ही के लिए भस्मासुर साबित हो रहा है। आतंकवाद को हिंदुस्तान के खिलाफ इस्तेमाल किया। हिंदुस्तान सदियों से आतंकवाद का दंश झेल रहा है। वहाँ के शासकों ने आवाम को इस मुगालते में रखा कि इसी के बल पर वो हिंदुस्तान को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देंगे। लेकिन उनका बोया विष-बीज आज विशाल विष वृक्ष बन गया है और आखिरकार उन्हीं के अमन-औ-चैन के लिए खतरा बन गया है।
पाकिस्तान की बुनियाद जातीय नफ़रत की ईंट से पड़ी। देश बार-बार सैन्य शासकों के हाथों की कठपुतली बना रहा। कभी लोकतंत्र को फलने फूलने का मौका नहीं दिया गया। वहाँ से शासक मुल्ला-मौलवियों ओर कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बने रहे। ज्यादातर शासको को परवर्ती शासकों के कोप का शिकार होना पड़ा। उन्हें भ्रष्ट और देश-द्रोही साबित किया गया। देश के संविधान और न्याय-व्यवस्था पर चंद लोगों का कब्जा रहा।
आज देश चौराहे पर खड़ा है। जिसका रास्ता आतंकवाद, अराजकता, तानाशाही और अमन की ओर जाता है। पर इस देश के लिए सही रास्ता चुनना हमेशा की तरह आज भी मुश्किल है।
पाकिस्तान की बुनियाद जातीय नफ़रत की ईंट से पड़ी। देश बार-बार सैन्य शासकों के हाथों की कठपुतली बना रहा। कभी लोकतंत्र को फलने फूलने का मौका नहीं दिया गया। वहाँ से शासक मुल्ला-मौलवियों ओर कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बने रहे। ज्यादातर शासको को परवर्ती शासकों के कोप का शिकार होना पड़ा। उन्हें भ्रष्ट और देश-द्रोही साबित किया गया। देश के संविधान और न्याय-व्यवस्था पर चंद लोगों का कब्जा रहा।
आज देश चौराहे पर खड़ा है। जिसका रास्ता आतंकवाद, अराजकता, तानाशाही और अमन की ओर जाता है। पर इस देश के लिए सही रास्ता चुनना हमेशा की तरह आज भी मुश्किल है।
बुधवार, 26 दिसंबर 2007
सेकुलरवाद की खुली पोल
गुजरात चुनाव के परिणामों से तथाकथित सेकुलर ब्रिगेड की पोल खुल गयी है। गुजरात की जनता ने अपने लिए काम करने वाले योग्य और कुशल उम्मीदवार को चुना है। धर्मं-निरपेक्षता की चादर ओढ़कर तुष्टिकरण की राजनीती करनेवालों को नकार दिया है। जहाँ तक २००२ के गुजरात दंगों की बात है। जनता उसे भूल चुकी है। तभी तो मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली मीडिया को मुँह की खानी पड़ी है। नयी दिल्ली के एक टीवी समूह ने तो अपने ही चैनल द्वारा स्थापित आदर्श पत्रकारिता के मानदंडों की धज्जियाँ उड़ते हुए अपने चैनल के साख पर बट्टा लगा दिया है। इस चैनल के एक लब्ध-प्रतिष्ठित एंकर ने तो तमाम हदें पर कर दी। उसके मुँह से निकले शब्द-- मोदी विकास के साबुन से सांप्रदायिक दंगों का खून धोना चाहते हैं-- बड़ा ही हास्यास्पद लगता है। इस चैनल को ऐसा लगता था कि हम अपने टीवी चैनल के बदौलत देश-प्रदेश की सरकार बदल सकते है। अगर ऐसा होता तो देश में पैसे वालों की कमी नहीं है। वे लोग भी अपना-अपना चैनल खोल कर रोज-रोज सरकार बनाते और गिराते। पर, शुक्र है कि ये लोकतंत्र है, और यहाँ जनता की चलती है। टीवी चैनलों की नहीं। जनता चैनलों को सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहती है। कुछ शहरों में कुछ संबाद-दाताओं के बल पर चैनल तो चलाये जा सकते हैं, पर जनता- के पास तक नहीं पहुंचा जा सकता है।
रविवार, 23 दिसंबर 2007
फिर आ गए मोदी
फिर आ गए मोदी। पूरे बैंग के साथ। १८२ सीटों वाली विधानसभा में उन्हें ११७ सीटें मिली। उन्हें मौत का सौदागर कहने वाली कांग्रेस को मात्र ६१। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के झंडा-बारदारों को मुँह की खानी पड़ी। खुद के-- जुबान पर सच, दिल में इंडिया का दावा करने वाली एक प्रचार-चैनल की सारी विज्ञापन बाजी की हवा निकल गयी। सारे राष्ट्र-विरोधी प्रचारकों का मुहँ लटक गया।
आखिर मोदी की मिहनत रंग लाई। मोदी के बोलने की कला और उनका रणनीतिक कौशल ने बीजेपी को चौथी बार गुजरात में वापस ले आई। इसके साथ गुजरात की जनता ने मोदी के काम को पसंद किया और तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौपी।
कांग्रेस ने खुद अपनी हर की नींव खोदी। पिछले चार सालों में कांग्रेस ने एक भी बड़ा जन आन्दोलन नहीं निकला। कांग्रेसी नेता अपनी मांद में सोये रहे। चुनाव आते ही सुगबुगाने लगे। ऊपर से कांग्रेस के अदूरदर्शी नेताओं का भाषण पढकर सोनिया गाँधी ने गूड गोबर कर दिया। बिना जाने समझे मोदी को मौत का सौदागर कह दिया। शायद उनको पता भी नहीं होगा कि मौत का सौदागर किसे कहते है। कांग्रेस नेता ये कैसे भूल गए कि उन्होने सिख दंगों के दौरान जमकर रक्त पट करवाया और राजीव गाँधी ने कहा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। खैर छोडिये, कांग्रेस ने गुजरात में मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं किया। ऐसी बात नहीं कि उनके पास नेताओं की कमी थी। मोदी जैसी शख्सियत नहीं, लेकिन शंकर सिंह वाघेला जैसे नेता उनमे जरूर थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें अछूत बनाए रखा और जिम्मेदारी नहीं सौपी।
यही कांग्रेस है, जिसकी अध्यक्ष, राजीव गाँधी फाउन्डेशन की भी अध्यक्ष हैं, ने मोदी सर्वोत्तम प्रशासन का अवार्ड दिया॥ आज उसी को मौत का सौदागर कहते हैं-- आखिर गुजरात कि जनता इसे कैसे बर्दास्त कराती।
मोदी ने जंगल की जमीन आदिवासियों को पट्टे पर देने का प्रस्ताव रखा, कांग्रेस ने इसका विरोध करके आदिवासियों से रार मोल ले लिया। वहीं दूसरी तरफ मोदी की कई योजनाएं सफल रही। उन्होने नर्मदा का पानी उत्तरी क्षेत्र के लोगों को देकर लोगों का दिल जीता। फिर हर वक्त लोगों के बीच रहे। चाहे एक प्रचारक के रुप में हों या नेता के रुप में॥ आखिर बीजेपी टीम के एक समर्पित खिलाडी को जनता ने मेन ऑफ़ दे मैच चूना॥ मुबारक हो मोदी। अगर मोदी की जीत से कोई खफा हो तो वह होता रहे.
आखिर मोदी की मिहनत रंग लाई। मोदी के बोलने की कला और उनका रणनीतिक कौशल ने बीजेपी को चौथी बार गुजरात में वापस ले आई। इसके साथ गुजरात की जनता ने मोदी के काम को पसंद किया और तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौपी।
कांग्रेस ने खुद अपनी हर की नींव खोदी। पिछले चार सालों में कांग्रेस ने एक भी बड़ा जन आन्दोलन नहीं निकला। कांग्रेसी नेता अपनी मांद में सोये रहे। चुनाव आते ही सुगबुगाने लगे। ऊपर से कांग्रेस के अदूरदर्शी नेताओं का भाषण पढकर सोनिया गाँधी ने गूड गोबर कर दिया। बिना जाने समझे मोदी को मौत का सौदागर कह दिया। शायद उनको पता भी नहीं होगा कि मौत का सौदागर किसे कहते है। कांग्रेस नेता ये कैसे भूल गए कि उन्होने सिख दंगों के दौरान जमकर रक्त पट करवाया और राजीव गाँधी ने कहा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। खैर छोडिये, कांग्रेस ने गुजरात में मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं किया। ऐसी बात नहीं कि उनके पास नेताओं की कमी थी। मोदी जैसी शख्सियत नहीं, लेकिन शंकर सिंह वाघेला जैसे नेता उनमे जरूर थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें अछूत बनाए रखा और जिम्मेदारी नहीं सौपी।
यही कांग्रेस है, जिसकी अध्यक्ष, राजीव गाँधी फाउन्डेशन की भी अध्यक्ष हैं, ने मोदी सर्वोत्तम प्रशासन का अवार्ड दिया॥ आज उसी को मौत का सौदागर कहते हैं-- आखिर गुजरात कि जनता इसे कैसे बर्दास्त कराती।
मोदी ने जंगल की जमीन आदिवासियों को पट्टे पर देने का प्रस्ताव रखा, कांग्रेस ने इसका विरोध करके आदिवासियों से रार मोल ले लिया। वहीं दूसरी तरफ मोदी की कई योजनाएं सफल रही। उन्होने नर्मदा का पानी उत्तरी क्षेत्र के लोगों को देकर लोगों का दिल जीता। फिर हर वक्त लोगों के बीच रहे। चाहे एक प्रचारक के रुप में हों या नेता के रुप में॥ आखिर बीजेपी टीम के एक समर्पित खिलाडी को जनता ने मेन ऑफ़ दे मैच चूना॥ मुबारक हो मोदी। अगर मोदी की जीत से कोई खफा हो तो वह होता रहे.
लेबल
धर्मनिरपेक्षता
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विचार
बुधवार, 19 दिसंबर 2007
मंगलवार, 18 दिसंबर 2007
मोदी फिर आ रहे हैं?
चुनाव के बाद के जनमत सर्वेक्षण कह रहे हैं कि मोदी फिर आ रहे हैं। वही व्यक्ति जिसे तथाकथित धर्म-निरपेक्ष बिरादरी पसंद नहीं करता--जिसे सोनिया मौत का सौदागर कहती हैं-- जिसे दिग्विजय सिंह "हिन्दू आतंकवादियों का मुखिया" कहते हैं-- जिसके खिलाफ जावेद अख्तर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। पता नहीं ये लोग कश्मीर में कश्मीरी पंडितों पर सालों से हो रहे जुर्म से आँखें क्यों मूंदे रहते है-- पता नहीं क्यों नंदीग्राम पर बुद्धदेव के बयान पर जावेद साहेब सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जाते?-- पता नहीं क्यों असाम में आदिवासियों के खिलाफ सुनियोजित हिंसा की चीख से इनकी नींद क्यों नहीं खुलती?-- पता नहीं, क्यों ये लोग सिखों के कत्ले-आम पर सवाल उठाते? एक व्यक्ति जो आज विकास की बात करता है--उसे ये लोग मौत का सौदागर कहते हैं। बे-ईमान और दहशतगर्द कहते हैं। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं। एक व्यक्ति जो आतंकवादी को आतंकवादी कहता है तो उसके खिलाफ सरे लोग खडे हो जाते हैं। सोनिया मैडम कहती हैं-- कि बीजेपी देश में आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। गृहमंत्री साहेब कहते हैं कि इस आतंकवाद और नक्सल समस्या निकट भविष्य में खतम नहीं हो सकता है। इस साल इस देश में आतंकवाद की कम से कम दस बड़ी घटनाएँ हुयी और इतनी ही नक्सल की घटनाएँ॥ इन घटनाओं में कम से कम पांच सौ लोग मरे गए॥ अगर असाम की आतंकवादी घटनाओं को जोड़ दिया जाये तो यह संख्या आठ सौ तक पहुंच जायेगी॥ और मैडम कहती है कि बीजेपी आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। अब तक कितने आतंकवादी घटनाओं की सही जांच हो पायी है और कितने आतंकवादियों को सजा मिल पाई है। आख़िर ये सवाल तो उठेंगे। अगर बीजेपी आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है तो आप धर्म का ढिंढोरा पिटने लगती है और कहती है कि देश को पोटा की कोई जरूरत नही है।
हमले तो बीजेपी के शासन में भी हुए लेकिन विमान अपहरण मामला को छोड़कर बीजेपी ने सभी हमलों का मूह्तोड़ जवाब दिया दुश्मन यहीं, इसी धरती पर दम तोड़ गए। पर आपके शासन में, आपने हमलों का जवाब दिया? खैर मैं ये सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ। जनता की प्रतिनिधि आप हैं। पर सवाल आप ही का खड़ा किया हुआ है। गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को सर आंखों पर क्यों बिठाये हुए है? इसका जवाब खोजने के लिए आपको ज्यादा परेशां होना नहीं पड़ेगा।
फ़िलहाल हम और आप गुजरात चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करें॥ देखें गुजरात की जनता का भगवान मालिक है या फिर आप?
हमले तो बीजेपी के शासन में भी हुए लेकिन विमान अपहरण मामला को छोड़कर बीजेपी ने सभी हमलों का मूह्तोड़ जवाब दिया दुश्मन यहीं, इसी धरती पर दम तोड़ गए। पर आपके शासन में, आपने हमलों का जवाब दिया? खैर मैं ये सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ। जनता की प्रतिनिधि आप हैं। पर सवाल आप ही का खड़ा किया हुआ है। गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को सर आंखों पर क्यों बिठाये हुए है? इसका जवाब खोजने के लिए आपको ज्यादा परेशां होना नहीं पड़ेगा।
फ़िलहाल हम और आप गुजरात चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करें॥ देखें गुजरात की जनता का भगवान मालिक है या फिर आप?
रविवार, 9 दिसंबर 2007
झुलसती मासूमियत

कल तक ये किसी के सपनों का आशियाना था। आज खंडहर बन गया है। कुछ दहशतगर्दों, कुछ गुंडों ने पहले तो इन्हें जम कर लूटा, फिर फूक दिया। लोगों को पीटा। उन्हें मौत के घाट उतरा। ये लोग कोई और नहीं थे। पड़ोस में रहने वाले लोग थे। कभी हमदर्द हुआ करते थे। आज एकाएक खून के प्यासे हो गए।
बुधवार, 5 दिसंबर 2007
मंगलवार, 4 दिसंबर 2007
मोदी बड़ा या गुजरात
एक वक्ता था, जब इंदिरा के बारे में किसी कांग्रेसी नेता ने कहा-- इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। साफ है कि इंडिया की पहचान आज इंदिरा गाँधी से नहीं है। उसी तरह मोदी गुजरात से बड़ा नहीं है। क्योकि गुजरात से मोदी हैं, मोदी से गुजरात नहीं। गुजरात तब भी रहेगा, जब मोदी नहीं रहेंगे। कितने मोदी आएंगें कितने जाएंगे। पता नही।
प्रायः सभी राष्ट्रीय चैनलों ने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है। जुबान पर सच कहने वाले एक राष्ट्रीय चैनल ने तो बाकायदा मोर्चा खोल रखा है। इस चैनल पर इस समय करीब बीस प्रतिशत कार्यक्रम मोदी बनाम गुजरात के नाम पर चलाया जा रहा है।
इस साल के सबसे बडे प्रस्तोता के मुहँ से बड़ी हास्यास्पद बात निकलती है- कि मोदी विकास के साबुन से सांप्रदायिक दंगों का खून धोना चाहते हैं।
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि गुजरात दंगों में खून बहा- अगर हिन्दू और मुसलमान के खून का रंग अलग अलग होता तो शायद पता चल जाता कि इस दंगें में मुसलमान के साथ हिन्दू भी मारे गए थे।
गुजरात दंगों के साथ गोधरा ट्रेन अग्निकांड का जिक्र क्यों नहीं किया जाता। आखिर क्या कसूर था उन कारसेवकों का जिन्हें कथित बेस्ट बेकरी से भी बढकर मौत मिली। अठावन लोंगों को एक साथ भट्ठी में झोंक किया गया।
सियासत के जंग में अगर बीजेपी मौत का सौदागर है तो कांग्रेस और वामपंथियों ने भी किसी से कम जुर्म नहीं ढाए।
१९८४ के सिख विरोधी दंगे, नंदीग्राम जनसंहार, असाम में चल रहे जातीय हिंसा पर तथाकथित जुबान पर सच सच होने का दवा करने वाली मीडिया चर्चा करने से क्यों बचती रहती है।
अगर इस देश में हिंदुत्व वादी राजनीती जिंदा है तो वो मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से। कांग्रेस और तथाकथित छद्म-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की वजह से।
हमारी राष्ट्रीय मीडिया जिस तरह से मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, उससे मोदी का कतई नुकसान नहीं होगा। मोदी और ताक़तवर होकर उभरेंगे।
आप मोदी के विकास के नारे का विरोध करते हैं। बाढ़, भूकंप, सूखा और सांप्रदायिक दंगों से जूझते गुजरात में मोदी ने जो विकास कर दिखाया वह सिर्फ मोदी ही कर सकता है।
यह सच है की मोदी किसी की बात नहीं सुनते, किसी को घूस लेने नहीं देते, भर्ष्टाचार पर लगाम कसे हुए हैं। ऐसे में उनके कई अपने विरोधी हैं तो आश्चर्य कैसा?
प्रायः सभी राष्ट्रीय चैनलों ने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है। जुबान पर सच कहने वाले एक राष्ट्रीय चैनल ने तो बाकायदा मोर्चा खोल रखा है। इस चैनल पर इस समय करीब बीस प्रतिशत कार्यक्रम मोदी बनाम गुजरात के नाम पर चलाया जा रहा है।
इस साल के सबसे बडे प्रस्तोता के मुहँ से बड़ी हास्यास्पद बात निकलती है- कि मोदी विकास के साबुन से सांप्रदायिक दंगों का खून धोना चाहते हैं।
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि गुजरात दंगों में खून बहा- अगर हिन्दू और मुसलमान के खून का रंग अलग अलग होता तो शायद पता चल जाता कि इस दंगें में मुसलमान के साथ हिन्दू भी मारे गए थे।
गुजरात दंगों के साथ गोधरा ट्रेन अग्निकांड का जिक्र क्यों नहीं किया जाता। आखिर क्या कसूर था उन कारसेवकों का जिन्हें कथित बेस्ट बेकरी से भी बढकर मौत मिली। अठावन लोंगों को एक साथ भट्ठी में झोंक किया गया।
सियासत के जंग में अगर बीजेपी मौत का सौदागर है तो कांग्रेस और वामपंथियों ने भी किसी से कम जुर्म नहीं ढाए।
१९८४ के सिख विरोधी दंगे, नंदीग्राम जनसंहार, असाम में चल रहे जातीय हिंसा पर तथाकथित जुबान पर सच सच होने का दवा करने वाली मीडिया चर्चा करने से क्यों बचती रहती है।
अगर इस देश में हिंदुत्व वादी राजनीती जिंदा है तो वो मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से। कांग्रेस और तथाकथित छद्म-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की वजह से।
हमारी राष्ट्रीय मीडिया जिस तरह से मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, उससे मोदी का कतई नुकसान नहीं होगा। मोदी और ताक़तवर होकर उभरेंगे।
आप मोदी के विकास के नारे का विरोध करते हैं। बाढ़, भूकंप, सूखा और सांप्रदायिक दंगों से जूझते गुजरात में मोदी ने जो विकास कर दिखाया वह सिर्फ मोदी ही कर सकता है।
यह सच है की मोदी किसी की बात नहीं सुनते, किसी को घूस लेने नहीं देते, भर्ष्टाचार पर लगाम कसे हुए हैं। ऐसे में उनके कई अपने विरोधी हैं तो आश्चर्य कैसा?
रविवार, 2 दिसंबर 2007
इन्हें सब पता था
असाम में आदिवासियों पर हिंसा सुनियोजित थी। इसके लिए कई रोज पहले योजना बनी थी। इस बात का खुलासा एक खुपिया विभाग की उस रिपोर्ट से हुआ -- जो राज्य सरकार और राज्य के आला पुलिस अधिकारियों को सौपा गया था। रिपोर्ट सोलह तारीख को सौंपा गया था और घटना घटी चौबीस को। यानी सरकार को सचेत होने और उचित एहतियाती कदम उठाने के लिए पर्याप्त समय था। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। घटना चूंकि सुदूर पूर्वोत्तर राज्य का है, इसलिए बवाल नहीं मचा। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों ने तसलीमा नसरीन में लोंगों को उलझाये रखा। और जातीय हिंसा की एक बड़ी घटना को सुर्खी बनने नहीं दिया। गुजरात दंगों पर शोर मचाना उनकी आदत में शुमार हो गया है। पर नंदीग्राम जनसंहार को माओवादियों का कारनामा करार देकर बुद्धदेव सरकार को बचा लेते हैं। आखिर असाम सरकार ने गुवाहाटी हिंसा की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं।
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