हिंदी शोध संसार

गुरुवार, 29 नवंबर 2007

मधुशाला के अमर गायक

मिट्टी का तन
मस्ती का मन
क्षण भर जीवन
मेरा परिचय
जीवन के संबंध में इतनी सटीक और सुलझी सोच! यही कारण है है की बच्चन जी ने जीवन की जटिलताओं के बारे में सोचने की फुरसत नहीं निकाली। जीवन-दर्शन साफ था- वर्तमान को मुट्ठी में कैद करके उसे जीना ही जीवन है। उनकी पहली पत्नी श्यामा मात्र चौबीस बर्ष की आयु में चल बसी। हरिवंश राय के सामने उनका वर्तमान था। उन्होने तेजी सूरी से दूसरी शादी की। कई लोगों ने कवि के इस कदम की आलोचना की। बच्चन ने अपनी कविता के माध्यम से आलोचकों की मुँह बंद कर दी।
जो बीत गई
सो बात गई
मन वह बेहद प्यारा था।
वे अँधेरी रात को कोसने के बजाय एक दिया जला लेना बेहतर समझते थे--
है अँधेरी रात
पर दीवा जलना कब मना है?
जीवन का सच ना तो इससे ज्यादा सरल ही हो सकता है, ना ही इससे ज्यादा ज्यादा जटिल ही। हरिवंश राय बच्चन ने जीवन के सच के सरलता को समझा। हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ अपने बाबूजी के इस जीवन दर्शन को हमेशा दुहराते हैं और हर बार जीवन की यही सच्चाई सामने आती है--
मन का हो तो अच्छा है
नहीं हो तो और भी अच्छा है।
क्योंकि हर नहीं होने में कहीं न कहीं प्राकृतिक अच्छाई छुपी रहती है।
अमिताभ के जीवन में कई बार या बार-बार चढाव-उतार आते रहे हैं। एक बार अमिताभ ने अपने पूज्य पिता से कहा पिताजी जीवन में बहुत-सी कठिनाइयाँ हैं। पिता का जवाब था-- अगर जीवन है तो कठिनाइयाँ हैं।
जीवन के सच की सरलता को हरिवंश राय बच्चन ने समझा। वहीं इस जीवन के सच की जटिलता को महादेवी वर्मा ने समझा था--
मैं नीर भरी दुःख की बदरी
परिचय इतना इतिहास यही
उमरी कल थी बह आज चली
जीवन क्या है? इसकी क्या है? किसी को पता नहीं। जीवन के रास्तों के बारे मैं कोई नहीं जानता। जीवन कोई फिल्म नहीं, ना ही इसका निर्देशक हमें यह बताता है कि हमें कैसे चलना है। हमारे रास्ते कैसे हैं। यही तो जीवन है। यही इसकी सच्चाई है। अगर सब कुछ पहले पता होता तो यह जीवन फिल्म की तरह होती। इसमे सच्चाई जैसे कोई बात नहीं होती। लोग झूठ में जीते।
जीवन के रास्तों के बारे में में डॉ बच्चन कहते हैं--
पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले
पुस्तकों में है नही
छापी गई इसकी कहानी
खोल पंथी अर्थ इसका
पंथ का अनुमान कर ले
बच्चन ने जीवन को समझा। इसके आसान सच को समझा।

बुधवार, 28 नवंबर 2007

विज्ञापन चैनल

कुछ रोज मैंने इसी ब्लोग पर एक लेख लिखी थी- श्रद्धा का श्राद्ध। उस लेख मैंने खबरिया न्यूज़ चैनलों पर जम कर भड़ास निकाली थी। एक बार फिर भड़ास निकालने का मौका है।
इस बार कई बहाने हैं।
पहला मसला असाम का है।
वहाँ, चौबीस तारीख शनिवार को आदिवासियों ने खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल किये जाने की मांग को लेकर गुवाहाटी में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की रैली राजधानी दिसपुर जा रही थी. प्रदर्शन में आम तौर पर जो होता है-- मसलन, तोड़-फोड़ वही उसमें भी हुआ। फिर क्या, स्थानीय निवासियों ने कानून अपने हाथ में ले लिया। जो प्रदर्शन में शामिल नहीं भी थे, उनपर भी इतना बड़ा अत्याचार किया कि जिसपर मानवाधिकार का शोर मचाने वालों को भी शर्म आ जाये।
जहाँ सड़कों पर लाशों की कतार लगी है। वहीं सरकार एक मौत की पुष्टि कर रही है।
आठ-दस साल के छोटे-छोटे बच्चों पर इस कदर जुर्म ढाये गए कि नजारा देखकर रोंगटे खडे हो जाये।
भागलपुर की घटना में पुलिसिया जुर्म पर, पूरे पुलिस बिरादरी और राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले न्यूज़ चैनलों के पास अभिव्यक्ति के प्रतीक तसलीमा पर हो रहे अत्याचार को दिखाने से फुरसत कहाँ थी जो असाम के जनसंहार को दिखाते। आदिवासियों में सेलेब्रिटी और हाई प्रोफाइल जैसा कुछ होता कहाँ जो उसको मुद्दा बनाते। असाम वैसे भी भौगोलिक रूप से भारत से दूर दिखता है। इसलिए उसकी समस्याओं से मुम्बई और दिल्ली वालों को क्या लेना देना है। घटना दिल्ली और मुम्बई की होती तो तिल का ताड़ बनते देर नही लगती। मगर बात असाम की और वहाँ कांग्रेस की सरकार सो उसे दिखाने की जरूरत क्या है। बात बीजेपी शासित प्रदेशों की होती तो उसकी तीस को तीन सौ बनाया जाता। बात असाम की है इसलिए तीस भी एक बनकर रह गया।

शनिवार, 24 नवंबर 2007

विकिपीडिया पर संपादन आसान है।

मैंने विकिपीडिया को अपने ब्लोग से जोड़ दिया है। ब्लोग के दायीं और- हिन्दी के गौरव नाम से कुछ संजालों को जोड़ दिया गया है। आप इसमें विकिपीडिया खोजें। क्लिक करते ही आप हिन्दी विकिपीडिया पर चले जायेंगे। करसर नीचे जाएँ-- आपको वर्णमाला के अक्षर दिखेंगे।

मान लीजिये आप लंका-- के बारे में जानकारी रखतें हैं और उस पर लिखना चाहते हैं। ठीक है-- ल अक्षर को क्लिक करिये। आपको शब्दों की एक सूची दिखेगी। उसमें लंका शब्द खोजिये। उसे क्लिक कीजिए। आपको लंका पर एक लेख मिलेगा। इस समय वह लेख पूर्ण नहीं है। आप उसे पूरा करिये।
इसके लिए सबसे ऊपर देखिए-- संपादन करिये लिखा मिलेगा। बस उसे क्लिक करिये। और लिखना शुरू करिये।
एक बात और अपने लेख को सेव करना या सुरक्षित करना न भूलें। आपका लेख सभी हिन्दी भाषी लोगों को मिलेगा। पूरी दुनिया में।
बस हिन्दी को समृद्ध करने में अपना योगदान दीजिए।

हां एक बात जो सबसे जरूरी है-- लेख सबसे लिए उपलब्ध हो इसके लिए विकिपीडिया पर आपका लोग इन होना बहूत जरूरी है। विकिपीडिया के सबसे ऊपर लोग इन करने के बारे में कहा गया है। एक मिनट का काम है।
तो फिर तैयार हो जाएँ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2007

देश एक बार श्रंखलाबद्ध बम धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया। इस बार हमले देवभूमि उत्तर प्रदेश के तीन शहरों में हुए। राजधानी लखनऊ, फैजाबाद और कशी विश्वनाथ की धरती वाराणसी धमाकों से हिल गया। इन धमाकों में करीब पचास लोग मरे गए जबकि सौ से ज्यादा घायल हुए हैं। गृह मंत्रालय की और से वही घिसा-पिता बयान-- कि ये आतंकवादी हमला है। ये हमलावर देश के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ना चाहते हैं। हम आपसी सद्भाव को बढाकर, पूरे देश को एक सूत्र में पिरोकर, हमलावरों के हमले का जवाब दे सकते हैं। सी आर पी एफ का कोई कार्यक्रम था-- उस कार्यक्रम में हमारे गृह मंत्री जी ने बडे भावुकता में कह दिया कि निकट भविष्य में और आसानी से इस देश से आतंकवाद को ख़त्म नहीं किया जा सकता है। हमले करना या होना कोई बड़ी बात नहीं है। पर, सबसे बड़ी बात है कि हम उस हमले को रोकने के लिए क्या कर रहे हैं। नक्सली हमलों को हम भटके हुए नौजवानों की कारगुजारी कहकर माफ़ करते जा रहे हैं। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के गुप्त सिद्धांत पर हम आतंकवादियों को छोड़ते जा रहे हैं। देश के सबसे कोर्ट ने अफजल गुरु को फांसी की सजा दी। लेकिन गृहमंत्रालय उस सजा को लागू करने के लिए तैयार नहीं है। हम एक एक कर दहशतगर्दी के कारनामों को सहते जा रहे हैं। शायद देश के लोगों को अब इन धमाकों के साथ जीने के लिए सीख जाना होगा। हमें यह भूल जाना होगा कि हम किसी संप्रभु देश के नागरिक हैं। हम उस देश की बात कर रहे हैं-- जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जो जल्द ही तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति होने का सपना देखता है। हम इसे सुपर पॉवर बनने का सपना देखते हैं। देश जो अन्तरिक्ष के क्षेत्र में छठी बड़ी शक्ति बन चूका है।उस देश के नागरिक को अपने कल का पता नही है कि किस गली चौराहे पर उसके चिथड़े मिलेंगे।अमेरिका में हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, दुनिया में भारत सबसे ज्यादा आतंवादियों के निशाने पर है। इस सर्वेक्षण में बताया गया है कि इराक को छोड़ दे तो, भारत आतंवादियों का पसंदीदा निशाना है। इराक में वैसे भी आतंकवाद नही, बल्कि गृहयुद्ध है।भारत की स्थिति चिंताजनक है। हम ज्ञान आयोग, अल्पसंख्यक आयोग बनने में कभी कोताही नही करते। लेकिन राष्ट्रीय आन्तरिक सुरक्षा आयोग के बारे में बात भी नहीं करते।हर आतंकवादी हमले के बाद हमारा गृह मंत्रालय बयान लेकर प्रस्तुत हो जाता है, ऐसे जैसे इस मंत्रालय का गठन सिर्फ बयां देने और सिर्फ यह बताने के लिए हुआ है कि आतंकवादी हमले क्यों करते हैं और हमे इसका मुह्तोड़ जवाब कैसे देना चाहिऐ। एक निहत्थी जनता के लिए तो इतना उपदेश, पर जिस मंत्रालय के पास इतना संसाधन और इतनी बड़ी जिम्मेदारी है वह एकबार भी नहीं बताता है कि उसे क्या करना चाहिऐ। वह यह नहीं बताता है कि आगे वह क्या कर रह है। अगर मंत्रालय के पास साफगोई है तो महज इतना कि वह निकट भविष्य में आतंकवाद पर लगाम नहीं लगा सकता।

दोस्त दोस्त न रहा

कर्नाटक के नाटक का पर्दा फ़िलहाल गिर गया है। कर्नाटक में अवसरवादी राजनीती का जो नमूना देखने को मिल है, वह अन्यत्र मिलना मुश्किल है। जे डी एस सुप्रीमो एच डी देवेगौडा एक समय में देश के प्रधानमत्री थे। आज एक राज्य की राजनीती में सिमट कर रह गए हैं। इस राज्य पर भी उनका पुत्रमोह भारी है। उस समय कांग्रेस की गठबंधन सरकार को तोड़कर उनके बेटे ने बीजेपी के सहयोग से कर्नाटका में गठबंधन सरकार का गठन किया। उस समय देवेगौडा ने अपने विद्रोही बेटे और उनके सहयोगी उनचालीस विधायकों की बर्खास्गी की मांग कर डाली। जब सरकार बन गई तो बीस महीने तक सत्ता का सुख भोगा। पर जब अपने सहयोगी को सत्ता सुख देने की बारी आई तो पहले तो साफ इंकार कर गए लेकिन अपनी पार्टी में टूट को देखते हुए उन्होने बीजेपी को सरकार बनने में समर्थन देना स्वीकार किया। सातवें रोज जब शक्ति परीक्षण की बारी थी तो अपने वादे से मुकरते हुए बारह्सुत्री समझौता पत्र थमा डाली। इस पत्र के मुताबिक राज्य का असली मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ही होते, बी एस येदियुरप्पा सिर्फ स्टाम्प रह जाते। जो बीजेपी को स्वीकार नही हुआ, और इस गठबंधन का बुरा अंत हुआ। दक्षिण भारत में सरकार बनने के भाजपा सपने का अंत हो गया। लेकिन जे डी एस ने बीजेपी के साथ जिस तरह दगाबाजी की, उससे राजनीती का एक और अवसरवादी और घिनौना चेहरा सामने आ गया है.

गुरुवार, 22 नवंबर 2007

राजनीती घिनौना चेहरा

शायद आप थक गए होंगे नंदीग्राम, बुद्धदेव और सीएमपी का नाम सुनते- सुनते। सीएमपी ने भी भारतीय राजनीती के गिनौने चेहरे के साथ अपना नाम जोड़ लिया। पहले कांग्रेस थी जिसने इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख- विरोधी दंगे फैलाये और करीब तीन हजार सिखों के मौत के घाट उतारने में अहम भूमिका निभाई। उस समय राजीव गाँधी ने बडे फक्र से कहा कि जब विशाल पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।
राष्ट्रीय राजनीती में कांग्रेस का लम्बा सफर रह है और उसका अस्तित्व ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की वजह से है सो उसने अल्पसंख्यकों को लेकर लंबी चौडी राजनीती की है।
भाजपा शुरू से ही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ रही है। कहीं न कहीं भाजपा के कट्टरपन कि वजह कांग्रेस और तथा कथित सेकुलर वादी लोग हैं।
भाजपा के साथ भी गुजरात नरसंहार का नाम जुड़ा। नरेन्द्र मोदी खलनायक के रुप में सामने आये। गुजरात दंगों की शुरूआत गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाकर अट्ठावन कार सेवकों को जलाकर मार डालने के बाद होती है। कथित रुप से मोदी ने गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया कहा था। सेकुलर वादियों संसद से सड़क की धूल आसमान में डाल दी।
अब राजनीती में सबसे पक-साफ कहे जाने वाले वामपंथी बुद्धिजीवियों की बारी है। सीपीएम की प्राइवेट आर्मी ने नंदीग्राम में करीब डेढ़ सौ लोगों के मौत के घाट उतारे। इसमे महिला, बच्चे और अल्पसंख्यक शामिल हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। हजारों लोंगों को अब भी शिविरों में गुजरना पड़ रहा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार, गठबंधन से ज्यादा परमाणु मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए चुपचाप यह सब देखती रही। एक चोटी सी प्रतिक्रिया देने में प्रधानमत्री ने काफी देरी लगाई। कांग्रेस के प्रियरंजन दास मुंशी ने एकबार बोलने की कोशिश भी की तो वाम-विद्वानों ने उन्हें चुप रहने की नसीहत दे डाली।
बाबू बुद्धदेव ने काफी सोच-समझकर कहा- हमारे कार्यकर्ताओं ने तृणमूल की हिंसा का जवाब हिंसा से दिया। संसद भवन के सामने सीताराम येचुरी से इसी बात पर सफ़ाई मांगी तो पहले तो उन्होने यह बात मानने से इंकार कर दिया कि बुद्धदेव ने ऐसा कहा। जा ओन्न रेकॉर्ड की बात कही गयी तो उन्होने कहा- इसमे उन्होने गलत क्या कहा?
वामपंथियों का सही चेहरा अब लोगों के सामने आ गया है।
एक बात और, सिख विरोधी दंगे और नंदीग्राम दंगा किसी खास क्षेत्र में फैला था। और इसे रोका नहीं जा सका। वहीं गुजरात का दंगा पूरे गुजरात में फैला था। और पुलिस ने पहले दिन दो लोगों को गोली मारी थी। इससे वामपंथियों के इस दावे का पर्दाफास हो जाता है कि तीन दिनों तक मोदी ने पूरी छूट दे रखी थी।

शुक्रवार, 16 नवंबर 2007

ये ना भूलो कि नंदीग्राम तुम्हारा है

बदनसीब, गम के मारे ये तुम्हारे हैं।
खून से लथपथ, कफ़न में लिपटे सब तुम्हारे हैं।

किया कबूल जो भी दिया तुमने
जिन्दगी हो या मौत सब तुम्हारे हैं

ये ना सोचा था कि सियासत के पंजे खूनी होन्गे
बिछाए जाल और डाले दाने तुम्हारे होन्गे।

हमें गुमान था की हैं हम अलग सबसे
मेरे खून बहाने वाले लोग तुम्हारे होन्गे

चुप करके मुझे, ये न तुम भूलो
ये नंदीग्राम, ये लोग तुम्हारे हैं।

गुरुवार, 15 नवंबर 2007

अब क्यों चुप हो?

बहुत दिनों से चुप थे- बाबू बुद्धदेव भट्टाचार्य। हाँ वही, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री- बाबू बुद्ध देव भट्टाचार्य। वैसे भी वे काफी कम बोलते हैं। लोगों ने नंदीग्राम को लेकर काफी बवाल मचाया। वाममोर्चे को जवाब देना पड़ रह था। काफी फजीहत हो चुकी थी। सौ- पचास लोगों की हत्या को लेकर लोगों ने बवाल मचा रखा था। कभी प्रकाश करात, कभी सीताराम येचुरी, तो कभी बिन्दा करात को जबाव देना पड़ रहा था। मीडिया तो काफी हद तक रहमदिली दिखाई, मगर मेधा पाटेकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तो नाक में दम कर रखा था। केन्द्र सरकार को तो गठबंधन धर्मं निभाना ही नहीं आता है। भाई जैसे पहले चुप थे वैसे चुप रहना चाहिऐ। खैर इस बात को निजी विचार मानकर हम तुम्हें क्षमा कर देते हैं। मगर भाई आगे नहीं बोलना। नहीं तो ये सरकार की सेहत के लिए ठीक नही होगा। जवाब देते देते कारात-युग्म और येचुरी परेशां थे। ऊपर से वाममोर्चे के सहयोगियों ने भी नंदीग्राम जनसंहार के लिए सीपीएम को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। पानी सर से गुजर गया था। आखिरकार बुद्धदेव भट्टाचार्य को जवाब देना पड़ा- उनहोंने कहा- यह तृणमूल की हिंसा का जवाब हिंसा से था। पिछले ग्यारह महीने से हमारे लोगों को बाहर रहना पड़ रह था। उन्होने हमारे लोगों को परेशां किया॥ उनकी हत्या की। तब ये चिल्लाने वाले लोग कहाँ थे?
ठीक है बाबू बुद्ध देव आपने काफी चुप रहकर, सोच-समझकर जो जवाब दिया। हम उसकी इज्जत करते हैं।
अब सवाल उठता है--
१- जब वे लोग आपके आदमियों को मार रहे थे, तो आप कहाँ थे?
२- क्या आपसे पश्चिम बंगाल के शासन व्यवस्था नहीं संभालती है?
३- क्या सीपीएम को छोड़कर पश्चिम बंगाल के बांकी लोग आपके नहीं हैं?
अंत में एक सवाल और
गुजरात दंगों के दौरान आपकी पार्टी ने वहां से अलाप्संख्यकों को पश्चिम बंगाल आने कहा था-- लेकिन पश्चिम बंगाल में आपने जिन लोगों को अलाप्संख्यक बना रखा है--उनको आप कहाँ भेज रहे हैं?
आपसे कुछ और सवाल पूछना है, लेकिन बाद में..

वे कविताएँ

तितली की सुन्दरता पर एक ये कविता देखिए--
दूर देश से आयी तितली चंचल पंख हिलाती
फूल-फूल पर कलि-कलि पर इठलाती-इतराती
कितने सुन्दर हैं पर इसके जगमग रंग रंगीले
लाल हरे बैंगनी बसंती काले नीले पीले

बच्चों ने देखे पर इसके खुशियां खेल निराले
छोड़ छाड़ के खेल खिलौनी दौड़ पड़े मतवाले
अब पकड़ी तब पकड़ी तितली पास नहीं आती
और हवा में उड़ते-उड़ते दूर बहुत उड़ जाती
दूर देश में जहां बहुत तितली परियां रहती
छोटे बच्चों से अचरज भरी कहानी कहती.

वे कविताएँ

मैंने अपने बचपन के दिनों में कुछ कविताएँ पढी थी। वो कविताएँ मुझे आज भी याद हैं। कविताओं को याद करने और रखने में मेरी यादाश्त से ज्यादा उन कविताओं का योगदान हैं। शायद उन कवियों में जो दम-ख़म था आज के कवियों में नहीं है। आज के कवियों के पास वो शब्द नहीं है और कविता रचने की वैसी कला नहीं है। आज की कविताएँ ऐसी होती हैं कि बच्चे पढ़्ना नहीं चाहते और जो पढ़ते है उन्हें कविताएँ याद नहीं हो पाती। छंद मुक्त कविता के नाम पर क्या लिखने लगें हैं, शायद उन्हें ये खुद पता नहीं है। कविता की छवि को बिगाड़ कर ऐसी KAVIYON को कवि होने का आत्म गौरव जरूर होता है।

महाकवि निराला जी ने छंद मुक्त कविता की शुरुआत की थी। लेकिन निराला जी की कविताओं में इस तरह की भाग-दौड़ नहीं थी। मुक्त छंद होते हुए भी उनके कविता सुग्राह्य थी। तो मैं बात कर रहा था। उन कविताओं के बारे में॥ उस ज़माने में कविता लिखने के लिए विषय थे। ऐसा नहीं कि आज समस्याए नहीं हैं और आज मुद्दा आधारित कविताएँ नहीं लिखी जा सकती है। पर लिखेगा कौन?एक कविता होली पर मैंने पढी थी। शायद दूसरी कक्षा में-- देखिए कविता कितनी जानदार है--
होली आई होली आई
अलमस्तों की टोली आई
ले लो ढोल मंजीरा झाल
गायें होली दे के ताल
होली में हम भरे गुलाल
हो गुलाल से धरती लाल
आज न कोई रजा रानी
आज ना कोई पंडित ज्ञानी
सब मिल के हैं रंग उडाते
गले लगते प्यार जताते
हम भी आपने घर पिचकारी लायें
घर-घर जाएँ रंग लगाएं
पूरी और मिठाई खाएं
हिल-मिल खाएं और खिलायें

बुधवार, 14 नवंबर 2007

बुद्धिजीवियों का सही चेहरा-2

आखिरकार जब कांग्रेस ने सी पी एम को इस जनसंहार के लिए जिम्मेदार ठहराया तो सीपीएम बिफड उठा। प्रदेश के राज्यपाल ने जब यही बात कही तो उन्हें हजम नहीं हुआ।
इन्सान के खून का रंग लाल होता है। मगर वामपंथी, इनकी पहचान हमारे आदमियों के नाम से करतें हैं। गुजरात में मुसलमान के मारे जाने से तो बिफड उठते हैं॥ पर नंदीग्राम नरसंहार को सही ठहराते हैं।

बुद्धिजीवियों का सच्चा चेहरा

एक गुजराती कवि था। जीवनभर खूब लिखा। प्रेम की कवितायें रचा। बुद्धिजीवियों को लगा की उसे ज्ञानपीठ पुरस्कार देना चाहिऐ और दे दिया। ज्ञानपीठ का मतलब भारतीय भाषा में सर्वश्रेष्ठ रचना पर मिलने वाला पुरस्कार। पुरस्कार मिलते ही वह कवि लोगों की नज़र में आ गया। कई बुद्धिजीवियों को लगा कि ये कवि भी बुद्धिजीवी नमक प्राणी है।

उस समय गुजरात में गोधरा बाद दंगे की आग भड़की हुई थी। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस नए बुद्धिजीवी से सवाल पूछ दिया-- गुजरात दंगों पर। उस कवि ने कहा कि यह दंगा गोधरा कांड की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। इतना भर काफी था। अपने मन अनुकूल जवाब नहीं पाकर बुद्धिजीवी बिरादरी भड़क उठी। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने बवाल मचा दिया। एक स्वर से सबने मांग कर डाली कि इसका ज्ञानपीठ छीन लिया जाये।
उस कवि को क्या जवाब देना चाहिऐ। -- शायद वो जो वामपंथी बुद्धिजीवियों को पसंद हो।
हालांकि उनके पसंद का पैमाना जगह- जगह, व्यक्ति-व्यक्ति के लिए अलग-अलग है। गुजरात दंगों के पांच बाद आज भी नरेन्द्र मोदी उनके लिए जनसंहारक है।
पर दूसरी तरफ नंदीग्राम है। वहाँ सी पी एम की अगुवाई वाली वाममोर्चे की सरकार है। पिछले कई महीनों से वहाँ जनसंहार जारी है। वहाँ विपक्षी दलों के नेताओ, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मीडिया को जाने नहीं दिया जा रहा है। इनमें से कईयों पर जानलेवा हमला किया गया। केन्द्र की यू पी ए सरकार अपनी राजनितिक मजबूरियों के चलते धृतराष्ट्र की तरह आँखें मूंदे हुए है।
ऐसे में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री कहते हैं कि तृणमूल को हिंसा का जवाब हिंसा से मिला। कहतें हैं उन्होने हमारे आदमियों की हत्या की।
जब नरेन्द्र मोदी को नरसंहार के लिए पद पर बने रहने का हक नहीं है तो बुद्धदेव को क्यो होना चाहिऐ?

सोमवार, 12 नवंबर 2007

बोल अनमोल

अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोअपि सेविनः
तस्य चत्वारी वर्धन्ते आयु विद्या यशो बलम


जो अभिवादन शील हैं और वृद्धों की सेवा करतें हैं, उनके आयु, विद्या, यश और बल आप से आप वृद्धि होती है।
सत्य नास्ति परोधर्मः

सत्य से बढकर कोई धर्मं नहीं है।

ज्ञानं भारः क्रिया बिना

कर्म के बिना ज्ञान भार के समान है।

संतोषम परम सुखं

संतोष सबसे बड़ा सुख है।

वीर भोग्य वसुन्धरा

धरती वीरों के भोग के लिए है

शरीर माध्यम खलु धर्मं साधनम

शरीर ही धरम का साधन है

गुरुवार, 8 नवंबर 2007

विकिपीडिया के बारे में

हमारे ब्लोग से सीधे विकिपीडिया पर जाएँ-- फिर विकी का सदस्य बनें-- फिर किसी लेख को चुनें जिसे आप बेहतर ढंग से संपादित कर सकते हैं। फिर संपादन करें पर क्लिक करें-- और हिन्दी में लिखना शुरू करें- अंत में प्रोजेक्ट सेव कर लें-- फिर देखिए ये जानकारी सबके लिए उपलब्ध होगी- आपकी अपनी भाषा हिन्दी में। विकिपेडिया के बारे में हमसे विचार बाँट सकते हैं।

विकिपीडिया के बारे में कुछ और

विकिपीडिया हिन्दी में है तो-- मगर इसे नहीं का भाई ही कह सकते हैं। हिन्दी विकिपीडिया में कहने के तो करीब चौदह हजार लेख हैं-- मगर इसमें मात्र तीन लेख-- महादेवी वर्मा, सत्यजीत राय और रामायण-- ही सम्पूर्ण लेख की श्रेणी में आते है। इस दुनिया में एक अरब से ज्यादा हिन्दी जानने वाले लोग रहते हैं। मगर अभी तक हिन्दी विकिपीडिया में मात्र तीन ही लेख लिखे जा सकें हैं। ऐसा क्यों? आपका ज्ञान कोष है विकिपीडिया। आप अपने ज्ञान कोष को खुद बढ़ा सकते हैं। तो बढ़ा लीजिये अपने ज्ञान कोष को। हिन्दी विकिपीडिया को दुरुस्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है। आप शुरू करिये- तरीका मैं बताता हूँ। हमारे ब्लोग पर दायीं और-- हिन्दी के गौरव स्थल नाम से-- कुछ नाम हैं आप हिन्दी विकिपीडिया पर जाएँ।

बुधवार, 7 नवंबर 2007

हिन्दीविकिपीडिया के बारे में

इन्सान मैं भी हूँ। इन्सान आप भी है। इन्सान हैं तो भूख भी है। इंसानी भूख जानवरों की भूख से थोडी अलग होती है। इन्सान की भूख महज रोटी से नहीं नहीं मिट सकती है। मिटे भी क्यों। इन्सान महज पेट लेकर ही तो पैदा नहीं हुआ है। इसके पास दिमाग भी है। दिमाग भी जानवरों की तरह पेट के सामानांतर नहीं बल्कि पेट से कम-से-कम दो फ़ीट ऊपर। दिमाग की खुराक है जानकारी। और इस जानकारी का कोई अंत तो है नहीं। ये भी ठीक है कि सबको हर प्रकार की जानकारी से क्या मतलब। तो भी जानकारी के लिए आप क्या करते हैं। वैसे आप कह सकते हैं कि जानकारी के लिए फुट्पाथी किताबों से लेकर बाज़ार में इन्सैक्लोपीडिया तक मौजूद है। मगर कई कारणों से ये किताबें आपकी जानकारी की बहुत बड़ी पिपासा को नहीं मिटा सकती। तो क्या जानकारी की भूख और प्यास से मर जाएँ? हम कहेंगें नहीं। आपके ज्ञान की प्यास को मिटाने के लिए कई लोग निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ लोगों ने आपके लिए विकिपीडिया तैयार किया है। विकिपीडिया-- ज्ञान-विज्ञान का अद्भुत कोष है। जहाँ तमाम प्रकार की जानकारी मौजूद है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि हर वक्त इसका संपादन होते रहता है। संपादक बडे विद्वान या ज्ञानी विज्ञानी नहीं होते हैं। बल्कि हम और आप जैसे लोग होते हैं। लेकिन हम हों या आप विकिपीडिया के संपादन के लिए उस विषय की पुख्ता जानकारी तो होनी ही चाहिऐ। साथ ही साथ हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिऐ कि कोई भी हमारी बात को पढकर ठीक से समझ जाय। आवश्यक है कि आप जिस विषय को ठीक से जानते हों उसी विषय पर लिखें। हिन्दी में विकिपीडिया की शुरुआत २००३ में हुई थी मगर कुछ समय पहले तक कंप्युटर पर हिन्दी में लिखने की समस्या थी इसलिए हिन्दी में ज्यादा लेख नहीं लिखे जा सके॥ पर अब हिन्दी में लिखना बिल्कुल सरल हो गया है। तो तैयार हो जाइये हिन्दी में विकिपीडिया को समृद्ध करने के के लिए॥ ताकि आपकी भाषा में भी हर जानकारी एक क्लिक की दूरी पर सिमट जाये।

शनिवार, 3 नवंबर 2007

श्रद्धा का श्राद्ध


ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं जब लोग कहा करते थे कि अब अखबारों के महान युग का अंत हो जाएगा। यह वह समय था जब टेलीविजन पर समाचारों का आना शुरू हुआ था और चौबीस घंटे समाचार के चैनलों ने दस्तक दिए थे। समय लम्बा नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतनी अपेक्षा तो जरूर की जा सकती है कि इसमें परिपक्वता आ जानी चाहिऐ। साब, अगर बेटा, अठारह साल में भी बालिग नहीं हुआ तो समझिए उसका भविष्य अंधकारमय है। हमारे टेलीविजन चैनलों का यही हाल है। और नहीं तो इतना जरूर कह सकते हैं कि इसका भविष्य अंधकारमय है। अपने देश में एक भी ऐसा हिन्दी टेलीविजन चैनल नहीं है जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं। सर्वश्रेष्ठ चैनल का लोगो लगाकर समाचार के नाम पर चौबीसों घंटे सनसनी, रहस्य रोमांच, सिनेमा, क्रिकेट और क्राइम का ऐसा घालमेल कर रखा है कि दर्शकों को सारा चित्र विचित्र लगने लगा है। इतना बड़ा घालमेल। सच बोलने का दावा कर किसी पार्टी का मुखपत्र की तरह काम करते हैं। जनता की नब्ज पकड़ने का दावा करते हैं। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण करते हैं, लेकिन यह सर्वेक्षण कितना सही होता है, कम से कम सब लोग इसे जानते हैं।

कहते हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं-- यहीं भूत, प्रेत, अन्धविश्वास। यार, क्यों सौ दो सौ पत्रकार नामक जीव का पेट भरने के लिए, और उनकी ऐय्याशी के लिए हिंदुस्तान के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हो?

बिना बुलाये अमिताभ के बेटे की शादी में चले जाते हो, फिर वहाँ से मार खाकर बाहर होते हो। और उसी की शादी, करवाचौथ, और फिर जन्मदिन की खबर दिखाने के लिए परेशान रहते हो।

आज भी अखबार--अख़बार है। आज भी एक हिंदुस्तान की जनता अख़बारों पर विश्वास करती है। कई अखवार पहले की तुलना में आज अच्छे हैं-- पर एक भी टेलीविजन चैनल को इसका दावा करने का हक शायद नहीं है।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2007

प्रगति मंत्र

चरै वेति चरै वेति असु मार्गः नवः कोआपि प्रस्तुतम

बढते चलो बढते चलो, शीघ्र कोई नया रास्ता तलाश करो।

गुरुवार, 1 नवंबर 2007

दिनकर जी के प्रति

राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर हमारे युग के महानतम क्रांतिधर्मी कवियों में से एक है। उनहोंने जन मानस में राष्ट्र चेतना निर्झरनी प्रवाहित करने की कोशिश की। वे उस प्रवृति के प्रबल विरोधी थे, जो उस समय भी शांति और शांति का मंत्र जपने में तल्लीन रहते हैं, जब राष्ट्र का सर्वस्व दाव पर लगा हो। वे कहते हैं...
स्वत्व छीनता हो कोई और तू त्याग तप से कम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ रहा तेरी तरफ जो हाथ है ॥
दिनकर जी का मानना था कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र का सबल होना बहुत जरुरी है। अगर व्यक्ति या राष्ट्र सबल है तभी उस नेक नीयती का लबादा अच्छा लगता है...
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.
उसको क्या जो दंत हीन विष हीन विनीत सरल हो..
दिनकर जी का ये साफ साफ मानना था कि जिस व्यक्ति के पास जीतने शक्ति हो, लोग उसी कि बात मानते हैं..
सच पूछो तो शर में ही बस्ती दीप्ति विनय की.
संधि वचन संपूज्य उसी की जिसमें शक्ति विजय की।

गुरु वंदना



वंदे बोधमयं नित्यम गुरुम शंकर रुपिनम
यमा श्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्दते


गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः

अखंड मंडला कारम व्याप्तं ये चराचरम
तद पदम दर्शितम ये तस्मै श्री गुरुवे नमः

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञान्नंजन श्लाक्या
चक्षु उन्मिलितम ये तस्मै श्री गुरुवे नमः
मैं अपराधी हीन मति, परों मोह के जाल
मम कृत दोष न मानिये तुम प्रभु दीन दयाल

तारा में शशि एक है शशि में तारा अनेक
हम सब तुमको एक हैं तुम सब हमको अनेक

श्री गुरु मंगल मुख चन्द्रमा सेवक नयन चकोर
अष्ट पहर निरखते रहो श्री गुरु चरण कि ओर